इंदौर: मिट्टी या प्लास्टर की जगह अनाज, घास और बीज से गणेश प्रतिमाएं गढ़कर छात्राओं ने इस बार पर्यावरण संरक्षण का अनूठा संदेश दिया. मालवमंथन के ‘विसर्जन से सृजन’ प्रकल्प के तहत मोती तबेला स्थित शासकीय आदिवासी एवं खंड स्तरीय अनुसूचित जाति कन्या छात्रावास में ईको फ्रेंडली गणेश प्रतिमा निर्माण कार्यशाला आयोजित हुई.
‘तृणधान्य गणेश’ थीम पर हुई इस कार्यशाला में छात्राओं ने प्राकृतिक सामग्री से प्रतिमाएं तैयार कीं. प्रशिक्षक जय प्रजापत ने छात्राओं को तृणधान्य और अन्य प्राकृतिक सामग्री से प्रतिमा बनाने की तकनीक सिखाई. उन्होंने सामग्री के चयन, उसे आकार देने और प्रतिमा को आकर्षक स्वरूप देने की बारीकियां बताईं। प्रशिक्षण के बाद छात्राओं ने स्वयं प्रतिमाएं बनाईं. मुख्य अतिथि डॉ. मालासिंह ठाकुर ने कहा कि भारतीय संस्कृति में प्रकृति के संरक्षण की परंपरा रही है. धार्मिक आयोजनों को पर्यावरण के अनुकूल बनाकर इस परंपरा को आगे बढ़ाया जा सकता है. प्रकल्प संयोजक डॉ. स्वप्निल व्यास ने बताया कि ‘विसर्जन से सृजन’ का उद्देश्य आस्था को पर्यावरण संरक्षण से जोड़ना है. इस बार तृणधान्य को केंद्र में रखकर अनाज, बीज और प्राकृतिक संसाधनों के महत्व को रचनात्मक तरीके से सामने लाया गया.
प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी होती है विकसित
छात्रावास अधीक्षिका ज्योति जोशी ने कहा कि ऐसी गतिविधियों से छात्राओं में रचनात्मकता के साथ प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी की भावना भी विकसित होती है. कार्यक्रम का संचालन वैशाली खरे ने किया. अंत में अतिथियों और छात्राओं ने पर्यावरण अनुकूल गणेशोत्सव मनाने का संकल्प लिया।
