
सुनील गोयल
ग्वालियर। महाभारत के रणक्षेत्र में अर्जुन के सामने जो संकट था, उसका स्वरूप आज बदल गया है, लेकिन संघर्ष वही है। तब सामने युद्ध, कर्तव्य और मोह का द्वंद्व था, आज करियर, प्रतिस्पर्धा, तनाव, असफलता, अपेक्षाओं और भविष्य की चिंता ने मनुष्य को घेर रखा है। ऐसे समय में करीब पांच हजार वर्ष पहले श्रीकृष्ण ने अर्जुन को जो जीवन-दृष्टि दी थी, वह आज भी मनुष्य को भीतर से मजबूत करने का रास्ता दिखाती है।श्रीमद्भगवद्गीता का संदेश केवल धर्म या अध्यात्म तक सीमित नहीं है। यह जीवन को संतुलित ढंग से जीने की कला सिखाती है। समत्व, अनुशासन, एकाग्रता और कर्मठता, ये चार सूत्र आज के जीवन में सफलता के साथ मानसिक शांति की भी आधारशिला बन सकते हैं। भगवान श्रीकृष्ण के विविध स्वरूपों एवं वर्तमान समय में उनकी शिक्षाओं की प्रासंगिकता पर नवभारत ने समाज के विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिनिधियों से चर्चा की…
समत्व : सफलता सिर पर नहीं, असफलता दिल पर नहीं
अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त कथक नृत्यांगना एवं नृत्यगुरु तथा राजा मानसिंह तोमर संगीत एवं कला विश्वविद्यालय की विभागाध्यक्ष डॉ. अंजना झा कहती हैं कि श्रीकृष्ण का सूत्र समत्वं योग उच्यते आज के तनावपूर्ण जीवन में बेहद महत्वपूर्ण है। उनके अनुसार समत्व का अर्थ भावनाहीन होना नहीं, बल्कि सफलता और असफलता के बीच मन का संतुलन बनाए रखना है। जीत मिले तो अहंकार न हो और हार मिले तो निराशा व्यक्ति को तोड़ न दे। आज सोशल मीडिया ने दूसरों की उपलब्धियों से तुलना की प्रवृत्ति बढ़ा दी है। लोग दूसरों की सफलता देखते हैं, लेकिन उसके पीछे छिपे संघर्ष और असफलताओं को नहीं देखते। इसलिए अपनी तुलना किसी दूसरे से नहीं, बल्कि अपने कल से करनी चाहिए। परिणाम से अधिक प्रक्रिया पर विश्वास और उपलब्धि से अधिक साधना का सम्मान ही समत्व है।
अनुशासन : प्रतिभा शुरुआत कराती है, मंजिल तक अनुशासन पहुंचाता है
गुना के जिलाधिकारी किशोर कन्याल के अनुसार जीवन में सफलता केवल प्रतिभा या अवसर से नहीं मिलती। इसके लिए लक्ष्य के प्रति निरंतर ईमानदारी और अनुशासन जरूरी है। गीता में श्रीकृष्ण ने कर्म, संयम, अभ्यास और कर्तव्य के प्रति अडिग रहने की शिक्षा दी है। गीता का संदेश है- युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु… अर्थात आहार-विहार, कर्म और दिनचर्या में संतुलन जीवन को व्यवस्थित बनाता है। कन्याल के अनुसार विद्यार्थी हो या कारोबारी, अधिकारी हो या खिलाड़ी सफलता के लिए नियमितता जरूरी है। आलस्य, काम टालने की आदत और तत्काल सुख की चाह अनुशासन को कमजोर करती है।
वे राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के जीवन-सफर का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि साधारण परिस्थितियों से देश के सर्वोच्च पद तक पहुंचने की यात्रा बताती है कि बड़ी उपलब्धियां अचानक नहीं मिलतीं। वे वर्षों की मेहनत, अध्ययन और निरंतर सीखने से बनती हैं।
“प्रतिभा आपको शुरुआत दिला सकती है, लेकिन अनुशासन ही आपको मंजिल तक पहुंचाता है।”
*एकाग्रता : लक्ष्य पर नजर, परिणाम ईश्वर पर*
जीवाजी विश्वविद्यालय, ग्वालियर के कुलगुरु डॉ. राजकुमार आचार्य कहते हैं कि लक्ष्य पर दृढ़ विश्वास और आस्था तभी मजबूत होती है, जब चिंतन में संकल्प शक्ति हो। इसके लिए भगवान कृष्ण का उद्घोष योगक्षेमं वहाम्यहम् जीवन को नई दृष्टि देता है। परिणाम उसे समर्पित करने से व्यक्ति निराश और कुंठित नहीं होता। कुलगुरु डॉ. आचार्य स्वामी विवेकानंद का उदाहरण देते हैं, जो गुरु की आज्ञा से शिकागो गए और विश्व के विद्वानों के बीच अपनी बात रखी। डॉ. आचार्य के अनुसार ईश्वर की कृपा से ही अनुकूलताएं निर्मित होती हैं। उनकी दृष्टि में कृष्ण को केवल ईश्वर के रूप में देखने के साथ-साथ उन्हें अपना पूर्वज, सखा और कला-कौशल से युक्त सर्वांगीण विकसित युवा भी माना जाना चाहिए। कृष्ण की लीलाओं को केवल चमत्कार के रूप में नहीं, बल्कि श्रेष्ठता और भारतीय ज्ञान परंपरा के संवाहक के रूप में समझने से समाज, राष्ट्र और विश्व कल्याण की भावना को बेहतर ढंग से समझा जा सकता है।
*कर्मठता : परिणाम की चिंता नहीं, प्रयास में कमी नहीं*
राजा मानसिंह तोमर संगीत एवं कला विश्वविद्यालय की कुलगुरु प्रोफेसर स्मिता सहस्रबुद्धे के अनुसार श्रीकृष्ण की सबसे प्रसिद्ध शिक्षाओं में से एक है- “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।” मनुष्य का अधिकार कर्म करने पर है, परिणाम पर नहीं। इसका अर्थ यह नहीं कि लक्ष्य या परिणाम महत्वहीन हैं। बल्कि लक्ष्य सामने रखकर सकारात्मक दृष्टिकोण से निरंतर काम करते रहना ही कर्मठता है।
प्रोफेसर सहस्रबुद्धे के अनुसार कार्य की गति रोकने वाले अनेक व्यवधान आते हैं, लेकिन एकनिष्ठ होकर लक्ष्य की ओर किए गए प्रयास सफलता की दिशा में ले जाते हैं। नकारात्मकता परिणामों की चिंता करती है, जबकि दृढ़ शक्ति सफलता की पूंजी है। कठिन परिस्थिति में भी कर्तव्य से विमुख न होकर आगे बढ़ते रहना ही कृष्ण का कर्मयोग है। इसलिए उनका जीवनमंत्र है कल के भय से आज मत बिगाड़ो।
*प्रेम, सत्य, धर्म और आत्मविश्वास भी कृष्ण-दर्शन का हिस्सा*
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर संत कृपाल सिंह महाराज कहते हैं कि जन्माष्टमी केवल भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का उत्सव नहीं, बल्कि उनके दिव्य संदेशों को जीवन में उतारने का अवसर है। उनके अनुसार गीता मानव जीवन को कर्म, सत्य, धर्म और आत्मविश्वास का मार्ग दिखाती है। मनुष्य को अपने कर्तव्य को पूरी निष्ठा और ईमानदारी से करते हुए परिणाम की चिंता ईश्वर पर छोड़ देनी चाहिए। आध्यात्मिक गुरु ने कहा कि श्रीकृष्ण का जीवन प्रेम में पवित्रता, कर्म में निष्ठा और कठिन परिस्थितियों में धैर्य रखना सिखाता है। जन्माष्टमी पर उनके उपदेशों को केवल सुनने के बजाय आचरण में उतारने का संकल्प लेना चाहिए, ताकि जीवन, समाज और राष्ट्र सत्य, प्रेम और सद्भाव से प्रकाशित हो सके। आज युवा परीक्षा, करियर, नौकरी, प्रतियोगिता और सोशल मीडिया की तुलना के दबाव में है। ऐसे में कृष्ण का संदेश उसे बताता है कि असफलता अंतिम सत्य नहीं है।
सफलता अंतिम मंजिल नहीं है।दूसरों की उपलब्धि आपकी कमी नहीं है। और परिणाम की अनिश्चितता आपके कर्म को रोकने का कारण नहीं हो सकती।
(एक बॉक्स में चारों विचार)
डॉ. अंजना झा: प्रशंसा से अहंकार न हो और कठिनाई से साधना न रुके यही समत्व है।
किशोर कन्याल: प्रतिभा शुरुआत दिला सकती है, लेकिन अनुशासन ही मंजिल तक पहुंचाता है।
डॉ. राजकुमार आचार्य: कृष्ण को श्रेष्ठता और भारतीय ज्ञान परंपरा के संवाहक के रूप में समझना समाज और राष्ट्र के लिए नई दृष्टि दे सकता है।
प्रो. स्मिता सहस्रबुद्धे: कल के भय से आज मत बिगाड़ो कठिन परिस्थिति में भी कर्म की गति मत रोकिए।
संत कृपाल सिंह महाराज: कृष्ण के संदेशों को केवल सुनें नहीं, उन्हें अपने आचरण में उतारने का संकल्प लें।
