
सोनकच्छ। भक्त भी भगवान बन सकता है, यह शब्द जब जलेबी खा रहे उस बालक पवन के कानों में सुनाई दी तो बालक पवन जलेबी खाते-खाते घर गया। मां से कहा कि मुझे महाराज के पास ले चलो, मुझे भी भगवान बनना है। मां बालक को महाराज के पास लाई और कहा महाराज हमारे मोड़ा को रख लो इसे भगवान बननो है। गुरुदेव को भी एक योग्य शिष्य की तलाश थी, उन्होंने बालक को रख लिया। गुरुदेव पुष्पदंत सागर का वह शिष्य पवन आगे जाकर क्रांतिकारी राष्ट्रसंत मुनि तरुण सागर महाराज बन गया।
यह बात पुष्पगिरि तीर्थ पर अपने चातुर्मास प्रवास के दौरान व्रतचक्रवर्ती पट्ट विभूषण अंतर्मना आचार्य प्रसन्न सागर महाराज ने ससंघ सानिध्य में उपस्थित भक्तों से कही। उन्होंने कहा कि जिन गुरु पुष्पदंत सागरजी ने बीज को वृक्ष बनाया। दिल में जगह देकर सीने से लगाया और भक्त को भगवान बनने की राह दिखाई। ऐसे क्रांतिकारी जन-जन के राष्ट्रसंत मुनि तरुण सागर महाराज के अष्टम समाधि दिवस पर मैं उन्हें अपनी भाव वंदना अर्पित करता हूं। विश्व को जैनत्व की पहचान दिलाने वाले संत तरुण सागरजी ने हमेशा अपने कड़वे प्रवचनों से जन-जन के जीवन में मिठास घोली है। गुरुदेव ने आज आचार्य प्रज्ञा सागरजी के जन्मोत्सव पर संघ सहित उन्हें भी प्रति नमोस्तु अर्पित किया।
प्रवक्ता रोमिल जैन ने बताया कि इस अवसर पर तरुण सागर महाराज के इकलौते शिष्य क्षु. पर्वसागरजी महाराज ने कहा कि गुरुदेव साथ-साथ जन-जन के संत तरुण सागर महाराज ने जैन साधुओं के प्रति अन्य धर्म के लोगों में आस्था और श्रद्धा जगाई, लोग तरुण सागरजी के नाम से ही जैनियों को जानने लगे। उनका जैसा संत जिनके चरणों में धनी, निर्धन, मंत्री, संतरी, स्त्री, पुरुष, जवान, वृद्ध सभी झुकना अपना परम सौभाग्य मानते थे; कभी-कभी ही धरा पर अवतरित होते हैं। उनका वात्सल्य सभी भक्तों के लिए आज भी अमूल्य निधि है। उनका आशीर्वाद सदा हम भक्तों पर बना रहे और उनके कड़वे प्रवचनों से हमें सदा प्रेरणा मिलती रहे। इसी भावना के साथ गुरु चरणों में नमन करता हूं।
