आंतरिक विकारों पर विजय ही सच्ची आध्यात्मिक साधना

भोपाल। जैन दर्शन में साधना का वास्तविक उद्देश्य केवल बाहरी क्रियाकलापों और धार्मिक अनुष्ठानों का पालन करना नहीं, बल्कि अपने भीतर उत्पन्न होने वाले विकारों और भावों पर विजय प्राप्त करना है। आचार्यश्री समयसागर जी महाराज ने भोपाल में आयोजित आध्यात्मिक प्रवचन में यह बात कही।

उन्होंने कहा कि साधक को धीरे-धीरे सांसारिक विकल्पों और आकर्षणों से ऊपर उठकर शुद्ध आंतरिक भावों की ओर अग्रसर होना चाहिए। कर्मों के उदय के समय उनके प्रभाव से मोहित नहीं होना चाहिए, क्योंकि मन में उत्पन्न होने वाले भाव और विचार भी आध्यात्मिक परिणामों को प्रभावित करते हैं।

आचार्यश्री ने कहा कि बाहरी परिस्थितियों को बदलने की अपेक्षा अपने भीतर के राग, मोह और नकारात्मक भावों पर विजय प्राप्त करना अधिक महत्वपूर्ण है। प्रशंसा भी साधक के मार्ग में बाधक बन सकती है, यदि उससे अहंकार अथवा अत्यधिक हर्ष उत्पन्न हो। इसी प्रकार भोजन के प्रति अत्यधिक आकर्षण या घृणा, दोनों भावों से ऊपर उठना ही वास्तविक आध्यात्मिक विजय है।

उन्होंने कहा कि गुरु व्रत प्रदान कर सकते हैं, लेकिन आध्यात्मिक विकास की विभिन्न अवस्थाएं साधक को अपने आचरण, संयम और पुरुषार्थ से ही प्राप्त करनी होती हैं। इसलिए क्रोध, मान, माया, लोभ और मोह जैसे आंतरिक कषायों पर विजय आवश्यक है।

प्रवचन में नमोस्तु को शांतिपूर्वक और विधिपूर्वक करने के महत्व पर भी जोर दिया गया। कहा गया कि केवल शारीरिक उत्साह या ऊंचे स्वर में अभिव्यक्ति से पूजा का वास्तविक उद्देश्य पूरा नहीं होता, बल्कि आंतरिक भावों की शुद्धता ही आध्यात्मिक फल निर्धारित करती है।

ध्यान की व्याख्या करते हुए बताया गया कि आर्त ध्यान और रौद्र ध्यान मुक्ति का मार्ग प्रशस्त नहीं करते, जबकि धर्म ध्यान और शुक्ल ध्यान आत्मा को मोक्ष की दिशा में अग्रसर करते हैं। प्रवचन का सार यही रहा कि यथार्थ का सही बोध, कषायों का क्रमिक क्षय और शुभ भावों के माध्यम से आत्मशुद्धि की ओर बढ़ना ही सच्ची आध्यात्मिक प्रगति है।

 

 

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