96 दिन तक ‘डिजिटल अरेस्ट’, घर बना जेल: बुजुर्ग दंपती से 22 लाख की ठगी; पुलिस-जज बनकर डराते रहे साइबर ठग

भोपाल: कोलार इलाके में साइबर ठगी का हैरान करने वाला मामला सामने आया है। आरोपियों ने पुलिस अधिकारी, चीफ इन्वेस्टिगेशन ऑफिसर और जज बनकर बुजुर्ग दंपती को 96 दिन तक वीडियो कॉल पर निगरानी में रखा। गिरफ्तारी और संपत्ति जब्त होने का डर दिखाकर दंपती से 22 लाख रुपये ठग लिए गए। 23 अगस्त को जब ठगों ने उन्हें ‘बरी’ होने की बात कही, तब दंपती थाने पहुंचा और पूरी सच्चाई सामने आई।

भोपाल में साइबर ठगी का एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसमें ठगों ने सिर्फ पैसे ही नहीं, बल्कि एक बुजुर्ग दंपती के 96 दिन डर और मानसिक दबाव में गुजार दिए। आरोपियों ने खुद को पुलिस अधिकारी, चीफ इन्वेस्टिगेशन ऑफिसर और जज बताकर दंपती को एक फर्जी कानूनी कार्रवाई में फंसा होने का भरोसा दिलाया।
ठगों की धमकियों का असर इतना गहरा था कि दंपती ने न किसी से मदद मांगी और न ही घर से बाहर निकलने की हिम्मत की। आखिरकार जेल जाने और संपत्ति जब्त होने के डर से उन्होंने अपनी जमा पूंजी और जेवर तक दांव पर लगा दिए और 22 लाख रुपये अलग-अलग बैंक खातों में जमा कर दिए।
दंपती के मुताबिक, इन 96 दिनों में उनका अपना घर ही उन्हें जेल जैसा लगने लगा था।
“डिजिटल अरेस्ट के दौरान हर दिन बोझ लगता था। घर को ही जेल बना दिया था। हमें बीपी, शुगर समेत कई बीमारियां हैं। हम दोनों ही एक-दूसरे का सहारा हैं।”
19 मई को आया पहला फोन, कहा- आपके नाम गिरफ्तारी वारंट है
पुलिस के मुताबिक, कोलार के कृष्णा कॉम्प्लेक्स, गणपति एन्क्लेव में रहने वाले सुवर्णा लक्ष्मी और नरसिम्हा राव मूल रूप से आंध्र प्रदेश के पलनाडू जिले के रहने वाले हैं।
19 मई को सुवर्णा लक्ष्मी के मोबाइल पर एक फोन आया। कॉल करने वाले ने खुद को दिल्ली के दरियागंज थाने का अधिकारी खन्ना बताया। उसने दावा किया कि महिला के नाम गिरफ्तारी वारंट जारी हुआ है।
इसके बाद ठगों ने उन्हें एक कथित मनी लॉन्ड्रिंग मामले से जोड़ दिया। दावा किया गया कि दिल्ली केनरा बैंक के एक खाते से नरेश गोयल से जुड़े मामले में करोड़ों रुपये का लेनदेन हुआ है।
पुलिस, गिरफ्तारी वारंट और करोड़ों रुपये के लेनदेन की बात सुनकर दंपती घबरा गया। इसके बाद आरोपियों ने उन्हें वीडियो कॉल पर पूछताछ के नाम पर अपने नियंत्रण में ले लिया।
वीडियो कॉल बनी ‘निगरानी का हथियार’
ठगों ने दंपती को निर्देश दिया कि वे किसी से इस मामले की चर्चा नहीं करेंगे और घर से बाहर भी नहीं निकलेंगे। इसके बाद लगातार वीडियो कॉल के जरिए उनकी निगरानी की जाने लगी।
दंपती को डराया गया कि अगर उन्होंने किसी से बात की या निर्देशों का पालन नहीं किया तो उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाएगा।
यहीं से शुरू हुआ 96 दिनों का डर।
बीपी और शुगर जैसी बीमारियों से जूझ रहे पति-पत्नी एक-दूसरे को हिम्मत देते रहे। उन्हें डर था कि किसी तीसरे व्यक्ति को जानकारी देने पर उनके खिलाफ कार्रवाई हो सकती है।
21 मई को ‘चीफ इन्वेस्टिगेशन ऑफिसर’ बनकर आई महिला
दो दिन बाद, 21 मई को एक महिला ने वीडियो कॉल किया। उसने अपना नाम निशा पटेल बताया और खुद को चीफ इन्वेस्टिगेशन ऑफिसर बताया।
कॉल के दौरान उसका चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था। उसने दंपती से उनके बैंक खातों, बैंकों के नाम और खातों में मौजूद रकम की जानकारी ली।
इसके बाद महिला ने दावा किया कि दंपती के बैंक खातों की जानकारी निकालकर सुप्रीम कोर्ट में जमा कर दी गई है। उसने यह भी कहा कि वह सुप्रीम कोर्ट से बात कर उनकी जमानत करवाएगी।
इस तरह ठगों ने दंपती को लगातार यह विश्वास दिलाए रखा कि वे एक बड़े आपराधिक मामले में फंस चुके हैं।
9 जून को बढ़ाया डर, कहा- पूरी संपत्ति होगी सीज
9 जून को दंपती को कथित जज से वीडियो कॉल पर बात कराई गई। इस दौरान उन्हें और डराया गया।
कथित जज ने दंपती की पूरी संपत्ति सीज करने की बात कही। इसके बाद निशा पटेल ने WhatsApp कॉल कर दावा किया कि सुप्रीम कोर्ट ने उनकी संपत्ति जब्त करने का आदेश दे दिया है।
दंपती को तुरंत भोपाल आने के लिए कहा गया।
जेवर गिरवी रखकर जुटाए 22 लाख रुपये
ठगों ने कथित कार्रवाई खत्म करने के नाम पर दंपती से एफडी और जेवर बेचने या गिरवी रखने को कहा।
दंपती 10 जून को आंध्र प्रदेश से रवाना हुए और 11 जून को भोपाल पहुंचे। अगले दिन यानी 12 जून को उन्होंने अपने जेवर गिरवी रखकर 22 लाख रुपये जुटाए।
इसके बाद ठगों के बताए अलग-अलग बैंक खातों में यह रकम पांच बार में जमा की गई।
दंपती को उम्मीद थी कि पैसे देने के बाद मामला खत्म हो जाएगा और वे इस ‘डिजिटल अरेस्ट’ से बाहर आ जाएंगे।
लेकिन ठगों का खेल यहीं खत्म नहीं हुआ।
22 लाख लेने के बाद भी जारी रही निगरानी
रकम जमा होने के बावजूद आरोपियों ने दंपती से संपर्क बनाए रखा। उन्हें बताया गया कि जांच अभी पूरी नहीं हुई है और उन्हें निगरानी में रहना होगा।
पुलिस के मुताबिक, आरोपियों ने दंपती से संपर्क के लिए सात अलग-अलग WhatsApp नंबरों का इस्तेमाल किया।
वीडियो कॉल के जरिए निगरानी जारी रही और दंपती को लगातार किसी से बात नहीं करने की हिदायत दी जाती रही।
23 अगस्त को कहा- ‘आप बरी हो गए हैं’
करीब 96 दिन तक डर में रखने के बाद 23 अगस्त को आरोपियों ने दंपती को बताया कि वे अब बरी हो चुके हैं और आजाद हैं।
दंपती ने अपनी बेगुनाही का प्रमाण मांगा तो आरोपियों ने कहा कि उन्हें क्लीनचिट मिल गई है और इसकी जानकारी संबंधित थाने से मिल जाएगी।
इसके बाद दंपती एक परिचित के साथ कोलार थाने पहुंचा।
लेकिन थाने पहुंचते ही उन्हें उस पूरे खेल की असली सच्चाई पता चली।
जिस गिरफ्तारी वारंट, पुलिस जांच, कोर्ट की कार्रवाई और संपत्ति जब्त होने के डर में दंपती 96 दिन तक जीता रहा, वह सब साइबर ठगों की बनाई हुई कहानी थी।
अब पुलिस इस मामले की जांच कर रही है।
एक कॉल, एक फर्जी केस और 96 दिन का डर
यह मामला सिर्फ 22 लाख रुपये की साइबर ठगी नहीं है। यह बताता है कि साइबर अपराधी किस तरह पुलिस, कोर्ट और कानून का डर दिखाकर लोगों को मानसिक रूप से अपने नियंत्रण में ले सकते हैं।
किसी भी फोन या वीडियो कॉल पर खुद को पुलिस अधिकारी, जज या जांच अधिकारी बताने वाले व्यक्ति के कहने पर पैसे ट्रांसफर न करें। अगर कोई व्यक्ति गिरफ्तारी या कानूनी कार्रवाई का डर दिखाकर आपको वीडियो कॉल पर निगरानी में रहने या पैसे जमा करने के लिए कहता है, तो तुरंत परिवार के किसी सदस्य, नजदीकी पुलिस थाने या साइबर क्राइम हेल्पलाइन से संपर्क करें।

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