नेपाल त्रासदी : पर्यावरण संतुलन का बड़ा सबक

नेपाल में बुधवार को आई भीषण प्राकृतिक आपदा ने एक बार फिर हिमालय की संवेदनशीलता और वहां विकास के मौजूदा तौर-तरीकों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. रसुवा और नुवाकोट जिलों में ग्लेशियर का बड़ा हिस्सा टूटकर गिरने, उसके मलबे से लेंधे खोला का प्रवाह बाधित होने और फिर प्राकृतिक झील के अचानक टूटने से आई बाढ़ ने जिस तरह तबाही मचाई, वह केवल एक प्राकृतिक घटना नहीं, बल्कि हिमालय को लेकर हमारी विकास-दृष्टि पर पुनर्विचार का अवसर भी है. इस त्रासदी में बड़ी संख्या में लोगों की मौत और लापता होने की खबरें, सडक़ों, पुलों, जलविद्युत परियोजनाओं और नेपाल-चीन व्यापार के महत्वपूर्ण केंद्र रसुवागढ़ी की तबाही इस खतरे की गंभीरता बताती है.

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ऐसी आपदाओं को केवल अतिवृष्टि या अचानक आई बाढ़ कहकर अपनी जिम्मेदारी से बचा नहीं जा सकता. हिमालय एक युवा और भूगर्भीय रूप से अत्यंत सक्रिय पर्वत श्रृंखला है. जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लेशियरों के पिघलने और पीछे हटने की प्रक्रिया तेज हो रही है. इससे ग्लेशियर झीलों के बढऩे और उनके अचानक फटने का खतरा भी बढ़ता है. इसके साथ यदि पहाड़ों की प्राकृतिक ढलानों को काटकर सडक़ें बनाई जाएं, नदियों के किनारे बेतरतीब निर्माण हो, सुरंगों और जलविद्युत परियोजनाओं का विस्तार बिना समग्र भौगोलिक अध्ययन के किया जाए तो प्राकृतिक जोखिम कई गुना बढ़ सकता है.भारत के लिए इसमें सबसे बड़ा सबक केदारनाथ की 2013 की त्रासदी का है. उस समय भी पर्यावरणविदों और वैज्ञानिकों ने चेताया था कि हिमालयी क्षेत्रों में विकास का मॉडल मैदानी इलाकों जैसा नहीं हो सकता. नदियों के प्राकृतिक प्रवाह क्षेत्र में निर्माण, ढलानों से अनावश्यक छेड़छाड़ और पर्यावरणीय क्षमता की अनदेखी अंतत: भारी कीमत वसूल सकती है. केदारनाथ के बाद भी कई बार यही सवाल उठता रहा है कि हिमालय में विकास चाहिए, लेकिन किस कीमत पर.

इसका अर्थ यह नहीं कि पहाड़ों में सडक़, बिजली, संचार और पर्यटन का विकास रोक दिया जाए. सवाल विकास रोकने का नहीं, विकास का नजरिया बदलने का है. हिमालय में हर परियोजना के पहले वहां की वहन क्षमता, भूकंपीय संवेदनशीलता, ग्लेशियरों की स्थिति, ग्लेशियर झीलों और नदी के प्राकृतिक मार्ग का वैज्ञानिक अध्ययन अनिवार्य होना चाहिए. संवेदनशील क्षेत्रों का स्पष्ट जोनिंग किया जाए और अत्यधिक जोखिम वाले क्षेत्रों में निर्माण पर कठोर प्रतिबंध हो.

नेपाल की त्रासदी भारत के लिए भी चेतावनी है, क्योंकि हिमालय की नदियां सीमाओं को नहीं मानतीं. नेपाल से निकलने वाली नदियों का प्रभाव बिहार और उत्तर प्रदेश तक पहुंचता है. इसलिए भारत और नेपाल को साझा हिमालयी आपदा प्रबंधन तंत्र विकसित करना चाहिए. ग्लेशियरों और ग्लेशियर झीलों की संयुक्त निगरानी, रियल टाइम चेतावनी प्रणाली, नदी जलस्तर की तत्काल सूचना और सीमा पार आपदा प्रबंधन अभ्यास समय की मांग हैं.

हिमालय हमारे लिए केवल पर्यटन और संसाधनों का क्षेत्र नहीं, बल्कि जल, पर्यावरण और जीवन का आधार है. उसे जितना समझेंगे, उतना ही सुरक्षित रहेंगे. पहाड़ों पर प्रकृति से मुकाबला करने की नहीं, उसके साथ चलने की विकास नीति ही भविष्य की त्रासदियों को रोकने का सबसे कारगर रास्ता है.

 

 

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