ईरान के सर्वोच्च नेता की रमजान में हत्या के राजनीतिक-आर्थिक के अलावा हो सकते हैं धार्मिक असर भी

रमेश भान से
नयी दिल्ली, 01 मार्च (वार्ता) अमेरिका-इजरायल के समन्वित सैन्य हमले में ईरानी सर्वोच्च नेता 86 वर्षीय अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत ने पूरे फारस की खाड़ी को बड़े संकट में डाल दिया है। इससे पूरे क्षेत्र में तनाव और अस्थिरता फैलने का भारी खतरा है। मुस्लिमों के पवित्र महीने रमजान के दौरान शियाओं के सर्वोच्च नेता की हत्या ने बड़ा क्षेत्रीय संकट पैदा कर दिया है, जिसके ईरान की आंतरिक स्थिरता के साथ-साथ व्यापक मुस्लिम जगत के लिए विनाशकारी परिणाम हो सकते हैं। इस हत्या के राजनीतिक और आर्थिक पहलुओं के अलावा धार्मिक निहितार्थ भी हो सकते हैं। श्री खामेनेई के पास 35 से अधिक वर्षों तक ईरान की सेना, न्यायपालिका और विदेश नीति पर निर्णायक अधिकार था। उनकी मौत से सत्ता में बड़ा शून्य पैदा हो गया है, क्योंकि किसी आधिकारिक उत्तराधिकारी का नाम घोषित नहीं किया गया है। एक अस्थायी शासी परिषद, जिसमें राष्ट्रपति, न्यायपालिका प्रमुख और गार्जियन काउंसिल के एक सदस्य शामिल हैं, ने नया नेता आने तक नियंत्रण संभाल लिया है। इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीएस) ने गणतंत्र के इतिहास में ‘सबसे विनाशकारी आक्रामक अभियान’ का संकल्प लिया है। ईरान ने कतर, कुवैत और बहरीन में अमेरिकी ठिकानों और क्षेत्रीय लक्ष्यों के खिलाफ पहले ही जवाबी मिसाइल हमले शुरू कर दिये हैं। यह संकट वैश्विक ऊर्जा बाजारों में उथल-पुथल और अस्थिरता पैदा करने की चेतावनी दे रहा है। हॉर्मुज जलडमरूमध्य, जहां से समुद्र के रास्ते होने वाले तेल निर्यात का एक तिहाई हिस्सा गुजरता है। वहां किसी भी प्रकार का व्यवधान दुनिया भर में ईंधन की कीमतों में भारी उछाल ला सकता है। ईरान ने पहले ही धमकी दी थी कि अगर उस पर हमला हुआ तो वह हॉर्मुज जलडमरूमध्य को बंद कर देगा।

हत्या रमजान में हुई है। यह समय ईरान और वैश्विक प्रतिक्रिया में महत्वपूर्ण धार्मिक आयाम जोड़ता है। इस पवित्र महीने के दौरान श्री अयातुल्ला की हत्या ‘बद्र की भावना’ (एक ऐतिहासिक इस्लामी जीत का संदर्भ) का आह्वान करती है, जो प्रतिरोध के बजाय पूरे मुस्लिम जगत में एकजुटता और लचीलेपन की भावना जगा सकती है। यह हत्या इमाम अली की शहादत के साथ भी मेल खाती है, जो शियाओं के पहले इमाम और पैगंबर मोहम्मद के दामाद थे। रमजान के दौरान जब वह नमाज पढ़ा रहे थे, तब उन पर हमला हुआ था। विश्व स्तर पर लगभग 20-26 करोड़ शिया हैं, जो दुनिया की मुस्लिम आबादी का 10-15 प्रतिशत हिस्सा हैं। भारत में शियाओं की संख्या 3-5 करोड़ है, जो कुल मुस्लिम आबादी का लगभग 15-20 प्रतिशत है और मुख्य रूप से लखनऊ, हैदराबाद, मुंबई और कश्मीर में केंद्रित हैं।
करबला, इराक और जम्मू-कश्मीर में शियाओं के शोक और विरोध प्रदर्शन आयोजित किये गये। जम्मू-कश्मीर (श्रीनगर, बडगाम जिलों) में शिया समुदाय के बीच बड़े पैमाने पर शोक और विरोध प्रदर्शन शुरू हो गये हैं। दुनिया के कुछ हिस्सों में हालांकि शासन-विरोधी ईरानियों ने इसे “दशकों के ‘धर्मगुरुओं का शासन से मुक्ति’ के रूप में मनाते हुए जश्न भी मनाया। भले ही श्री अली खामेनेई की हत्या की व्यापक निंदा हो रही है, लेकिन मुस्लिम जगत विभाजित है। जहां कुछ रमजान के दौरान मारे गये इस नेता को शहीद के रूप में देखते हैं, वहीं अन्य उनकी मौत को ईरानी लोगों के लिए अपने देश पर फिर से दावा करने के अवसर के रूप में देखते हैं। ईरान ने 40 दिनों के शोक काल और सात सार्वजनिक अवकाशों की घोषणा की है, जबकि अंतरराष्ट्रीय समुदाय क्षेत्रीय भड़काव का जोखिम उठा रहा है। ईरानी नेतृत्व, जिसने कुछ महीने पहले बड़े पैमाने पर सार्वजनिक विरोध प्रदर्शनों का सामना किया था, अब ईरानी नेता के लिए जनता की सहानुभूति की लहर देख सकता है। ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स ने चेतावनी दी है कि इस्लामिक गणराज्य के सशस्त्र बलों के इतिहास में ‘सबसे भीषण आक्रामक अभियान’ जल्द ही शुरू होगा। ईरान सरकार ने इस हत्या को ‘बड़ा अपराध’ करार दिया है, जिसे ‘कभी बिना जवाब दिये नहीं छोड़ा जायेगा और यह इस्लामी दुनिया के इतिहास में एक नया अध्याय लिखेगा’।

ईरान के शीर्ष सुरक्षा निकाय, सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद (एसएनएससी) ने कहा कि श्री अयातुल्ला की हत्या ‘दुनिया के उत्पीड़कों के लड़ने के लिए बड़े पैमाने पर विद्रोह की शुरुआत करेगी’। परिषद ने संकल्प लिया कि ईरान और उसके सहयोगी ‘अधिक लचीले और दृढ़’ होकर उभरेंगे। वैश्विक प्रभाव के बावजूद श्री अयातुल्ला की हत्या के भारत के लिए आर्थिक, रणनीतिक और घरेलू मामलों में महत्वपूर्ण निहितार्थ हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इजरायल यात्रा के कुछ ही दिनों बाद ईरान पर हुए हमलों का घरेलू स्तर पर कुछ असर पड़ सकता है। आर्थिक और ऊर्जा के दृष्टिकोण से हॉर्मुज जलडमरूमध्य में किसी भी तरह के व्यवधान से कच्चे तेल की कीमतों में उछाल आने की उम्मीद है। इससे भारत का आयात बिल बढ़ेगा, रुपया कमजोर होगा और पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ेंगी। लगभग 1.68 बिलियन अमेरिकी डॉलर (वित्त वर्ष 2024-25) का द्विपक्षीय व्यापार जोखिम में है। चावल, चाय और दवाओं के निर्यातकों को लॉजिस्टिक्स और बीमा लागत बढ़ने का डर है, क्योंकि शिपिंग मार्गों को ‘केप ऑफ गुड होप’ के रास्ते मोड़ना पड़ सकता है, जिससे पारगमन समय में 15-20 दिन और जुड़ जायेंगे। चाबहार बंदरगाह और अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे (आईएनएसटीसी) का भविष्य अब अनिश्चित है। ये परियोजनाएं पाकिस्तान को दरकिनार कर मध्य एशिया और अफगानिस्तान तक भारत की रणनीतिक पहुंच के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। भारत ने आधिकारिक तौर पर ‘अधिकतम संयम’ और बातचीत की ओर लौटने का आह्वान किया है। भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने तनाव कम करने पर चर्चा के लिए खाड़ी देशों के समकक्षों के साथ पहले ही बातचीत की है।

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