जनविश्वास… या फिर आत्मविश्वास की खोज

मध्य क्षेत्र की डायरी

संदीप चंसोरिया

प्रदेश सरकार ने मुख्यमंत्री जन-विश्वास अभियान शुरू किया है. सरकारी तौर पर इसकी मंशा बिल्कुल साफ है. जनता की शिकायतों का तत्काल निराकरण. सरकारी योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन. लोक सेवाओं की समय-सीमा में उपलब्धता. अभियान 7 अगस्त से शुरू हुआ. 8 जनवरी 2027 तक चलेगा. हर शुक्रवार को अभियान दिवस होगा. अफसर एसी रुम से निकलकर ग्राउंड पर होंगे. मुख्यमंत्री भी प्रदेश के किसी भी हिससे में पहुंचेंगे. प्रभारी मंत्री प्रभार के जिले में होंगे.

सरकार का दावा है वह जनता से सीधे समस्याएं सुनेगी. मौके पर समाधान भी करेगी. लापरवाही पर एक्शन भी होगा. सुनने में कवायद सुशासन की दिशा में एक गंभीर पहल लगती है. लेकिन, राजनीति में केवल घोषणा नहीं, घोषणा का समय भी मायने रखता है. विधानसभा चुनाव में अभी ढाई साल बाकी हैं. ऐसे में स्वाभाविक सवाल भी हैं. सरकार को अभी से जनता तक पहुंचने की जरूरत क्यों महसूस हुई? क्या यह प्रशासनिक व्यवस्था की खामियों का स्वीकारोक्ति है? या चुनावी राजनीति की शुरुआती दस्तक?

शिकायतें पहले से थीं, अब अभियान क्यों?

प्रदेश में जनता की शिकायतों के समाधान के लिए सीएम हेल्पलाइन, जनसुनवाई और लोक सेवा गारंटी अधिनियम जैसी व्यवस्थाएं पहले से मौजूद हैं. बावजूद इसके सरकार को अब एक अलग अभियान पर निकलना पड़ा. लंबित शिकायतों की समीक्षा, शत-प्रतिशत समाधान और मौके पर निराकरण की व्यवस्था करनी पड़ी. यदि व्यवस्थाएं पहले से प्रभावी थीं तो विशेष अभियान की जरूरत क्यों पड़ी? यदि सिसटम प्रभावी नहीं थीं तो प्रशासनिक पकड़ कमजोर हुई है? दरअसल, जनविश्वास अभियान एक ओर प्रशासन को जनता के प्रति जवाबदेह बनाने की कोशिश है. दूसरी ओर अघोशित स्वीकारोक्ति भी है कि प्रशासनिक तंत्र में कहीं न कहीं ऐसी खामियां हैं, जिन्हें विशेष अभियान से ठीक करने की जरूरत महसूस हुई.

सरकार का ग्राउंड कनेक्शन

मुख्यमंत्री मोहन यादव ने मंत्रियों को ग्राउंड पर उतरने की हिदायत दी है. जो इस अभियान को केवल प्रशासनिक कार्यक्रम नहीं रहने देती. मंत्री, विधायक और अधिकारी यदि क्षेत्र में जाकर लोगों से मिलेंगे तो वास्तविक फीडबैक मिलेगा. इसका एक राजनीतिक लाभ भी है. सरकार के पास यह जानने का अवसर है कि जनता में असली मुद्दे क्या हैं? कौन-सा वर्ग संतुष्ट है. कौन नाराज है. कहां सरकारी योजनाएं असर डाल रही हैं. कहां उनका लाभ कागजों से आगे नहीं बढ़ पा रहा है.

लाडली बहना से परे भी बहुत कुछ

प्रदेश की राजनीति में महिलाओं के बीच सरकार की पहुंच का एक बड़ा आधार लाडली बहना योजना रही है. लेकिन किसी भी सरकार के लिए केवल एक लोकप्रिय योजना के सहारे लंबे समय तक राजनीतिक समर्थन बनाए रखना आसान नहीं होता. महंगाई, रोजगार, किसानों की समस्याएं, युवाओं की अपेक्षाएं, स्थानीय स्तर पर भ्रष्टाचार और सरकारी दफ्तरों में कामकाज जैसे मुद्दे लगातार राजनीतिक विमर्श को प्रभावित करते हैं. माना जा सकता है यहीं जनविश्वास अभियान की भूमिका महत्वपूर्ण है. सरकार अभियान के बहाने स्थानीय स्तर पर प्रशासन के प्रति नाराजगी को दूर करने में जुट गई है. यानी सरकार यह समझ रही है कि लाभार्थी तक पैसा पहुंचाना और नागरिक का सरकार पर भरोसा कायम करना, दो अलग-अलग बातें हैं.

रैंकिंग का राजनीतिक मतलब

जिलों की साप्ताहिक परफॉर्मेंस रैंकिंग भी इस अभियान का महत्वपूर्ण हिस्सा है. इससे अधिकारियों पर दबाव बनेगा कि वे केवल आंकड़ों और रिपोर्टों में बेहतर प्रदर्शन न दिखाएं, बल्कि वास्तविक शिकायतों का समाधान करें. लेकिन यही रैंकिंग सरकार के लिए राजनीतिक आईना भी बनेगी. यदि किसी जिले में लगातार खराब प्रदर्शन सामने आता है तो सवाल स्थानीय प्रशासन से आगे बढ़कर सरकार की कार्यप्रणाली तक जाएगा. दूसरे शब्दों में कहें तो यह अभियान सरकार को डेटा भी देगा और चुनावी नैरेटिव भी.

असली चुनौती जनता की धारणा

सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह नहीं है कि वह कितने दौरे करती है या कितनी बैठकें आयोजित होती हैं. असली चुनौती जनता की धारणा बदलने की है. राजनीति में सरकार की छवि योजनाओं की सूची से नहीं बनती. वह इस बात से बनती है कि आम नागरिक को सरकारी दफ्तर में कितना सम्मान मिलता है. उसका काम कितनी जल्दी होता है. उसे शिकायत के लिए कितने चक्कर लगाने पड़ते हैं. जरूरत के समय सरकार उसके कितने करीब दिखाई देती है. यही कारण है कि जनविश्वास अभियान सरकार के लिए केवल प्रशासनिक परीक्षा नहीं है. यह राजनीतिक विश्वसनीयता की भी परीक्षा है. यदि अभियान के बाद वही शिकायतें फिर लौट आती हैं. वही फाइलें अटकती हैं. जनता को फिर वही पुराने चक्कर लगाने पड़ते हैं. तब सरकार के पास दोबारा जनता के बीच जाने का मौका भी नहीं होगा.

चुनाव दूर, तैयारी शुरू

चुनाव भले ही ढाई साल दूर हों, लेकिन राजनीति में ढाई साल बहुत लंबा समय नहीं होता. सत्ता पक्ष के लिए यह समय अपनी कमजोरियां पहचानने और उन्हें सुधारने का है. विपक्ष के लिए सरकार की कमियां खोजने और उन्हें राजनीतिक मुद्दे में बदलने का. जनविश्वास अभियान इसी राजनीतिक पृष्ठभूमि में शुरू हुआ दिखता है. इसलिए इसे चुनावी तैयारी से पूरी तरह अलग भी नहीं किया जा सकता. सरकार जनता के बीच जा रही है, उसकी शिकायतें सुन रही है, प्रशासन को मैदान में उतार रही है और जिलों की रैंकिंग कर रही है. यह सब सुशासन का हिस्सा है, लेकिन यही प्रक्रिया चुनावी रणनीति के लिए भी उतनी ही उपयोगी है. सरकार के सामने अब असली चुनौती जनविश्वास मांगने की नहीं, जनविश्वास साबित करने की है. क्योंकि, जनता के बीच जाना आसान है. जनता की बात सुनना भी आसान है. मुश्किल यह है कि सुनी हुई बात पर कार्रवाई हो. उसका असर जनता को दिखाई दे. जनविश्वास की सफलता का फैसला सरकारी रिपोर्ट नहीं करेगी. आने वाले समय में जनता करेगी. यही फैसला तय करेगा कि यह अभियान सुशासन की मिसाल बना या चुनावी तैयारी का एक और अध्याय.

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