भोपाल: स्मार्ट सिटी मिशन के तहत राजधानी में करोड़ों रुपए खर्च कर कई विकास परियोजनाएं शुरू की गईं। लेकिन साइकिल शेयरिंग, स्मार्ट पोल, अंडरग्राउंड डस्टबिन और दूसरी सुविधाओं को लेकर सवाल सामने आए। हमारी तीन-पार्ट सीरीज के तीसरे और आखिरी हिस्से में हमने इन सवालों को लेकर स्मार्ट सिटी प्रबंधन और नगर निगम के अधिकारियों से बात की और उनका पक्ष जाना।
साइकिल शेयरिंग योजना को लेकर स्मार्ट सिटी प्रबंधन ने बताया कि पुराने प्रोजेक्ट का टेंडर नवंबर 2025 में समाप्त हो चुका है। अब नए टेंडर के लिए आवेदन लेने की प्रक्रिया शुरू की गई है। प्रबंधन की ओर से आने वाले प्रोजेक्ट्स को लेकर भी जानकारी दी गई। साथ ही उनका कहना है कि स्मार्ट सिटी के तहत आने वाली दूसरी व्यवस्थाएं सही तरीके से संचालित हो रही हैं।
वहीं, स्मार्ट सिटी की प्लानिंग को लेकर भोपाल नगर निगम के पूर्व सहायक आयुक्त जी.पी. माली ने अलग राय रखी। फोन पर बातचीत में उन्होंने पर्याप्त जमीन उपलब्ध नहीं होने को प्रोजेक्ट की बड़ी चुनौती बताया। उनके मुताबिक, इतने बड़े शहर को स्मार्ट बनाने के लिए सीमित जमीन में पूरी स्मार्ट सिटी की परिकल्पना को लागू करना मुश्किल था।
दूसरी ओर, नगर निगम की तरफ से विकास कार्यों को लेकर सरकारी फंड की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया गया है। अधिकारियों के मुताबिक, सरकार से फंड उपलब्ध होने के साथ ही विकास कार्यों को आगे बढ़ाया जाता है और जरूरी परियोजनाओं पर काम किया जाता है।
इस पूरी सीरीज में हमने स्मार्ट सिटी मिशन के तीन अलग-अलग पहलू सामने रखे—पहले हिस्से में 1000 करोड़ रुपए से ज्यादा के खर्च और स्मार्ट सिटी के सफर को समझा, दूसरे हिस्से में जनता की राय और उनकी समस्याओं को सामने रखा और तीसरे हिस्से में स्मार्ट सिटी प्रबंधन और अधिकारियों का पक्ष जाना।
अब सवाल यही है कि करीब एक दशक के इस सफर और 1000 करोड़ रुपए से ज्यादा के खर्च के बाद भोपाल कितना स्मार्ट हुआ और स्मार्ट सिटी का लक्ष्य पूरी तरह हासिल करने के लिए अभी कितना काम बाकी है?
स्मार्ट सिटी का सच—सवाल भी सामने, जवाब भी सामने।
