
दिल्ली डायरी
प्रवेश कुमार मिश्र
जेन-जी यानी वर्ष 1997 से 2012 के बीच पैदा हुई आबादी को अपने पाले में करने के लिए भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के रणनीतिकारों ने पिछले दिनों की घटनाओं को देखते हुए अपनी पारंपरिक राजनीति को पूरी तरह बदलकर ‘डिजिटल और ट्रेंडी’ रूप दे दिया है. दोनों ही दल यह भली-भांति समझते हैं कि इस पीढ़ी का ध्यान खींचने के लिए लंबे भाषणों के बजाय कुछ सेकेंड्स का सटीक और तीखा कंटेंट सबसे बड़ा हथियार है. संभवतः इसी वजह से इस डिजिटल जंग में जहां एक तरफ भाजपा की रणनीति पूरी तरह से जेन-जी की महत्वाकांक्षाओं और उनकी ऑनलाइन आदतों के इर्द-गिर्द बुनी गई है. वहीं दूसरी तरफ, कांग्रेस पार्टी इस पीढ़ी के रोजमर्रा के संघर्षों, आर्थिक चिंताओं और उनके स्वभाव में छिपे विद्रोही रुख को अपना मुख्य हथियार बना रही है. इतना ही नहीं भाजपा नेशनल क्रिएटर्स अवार्ड्स जैसे आयोजनों के माध्यम से देश के बड़े यूट्यूबर्स और रील्स मेकर्स की एक मजबूत इन्फ्लुएंसर आर्मी तैयार कर रही है जो सरकारी योजनाओं को युवाओं की ही कूल भाषा में उन तक पहुंचाती है. पार्टी तकनीकी विकास, स्टार्टअप कल्चर, यूपीआई की सफलता और वैश्विक मंच पर भारत की बढ़ती साख को दिखाकर युवाओं में राष्ट्रवाद और आधुनिकता का एक ऐसा अनूठा मिश्रण भरने में जुटी है जबकि कांग्रेस का सोशल मीडिया हैंडल अब बेहद आक्रामक और समकालीन पॉप-कल्चर के रंग में रंगा नजर आता है, जहां बॉलीवुड गानों, ट्रेंडिंग रील्स और व्यंग्यात्मक मीम्स का इस्तेमाल कर सीधे सरकार की नीतियों पर चोट की जाती है. पार्टी पेपर लीक, बेरोजगारी और बढ़ती आर्थिक असमानता जैसे मुद्दों को जेन-जी का सबसे बड़ा संकट बताकर उन्हें अपने साथ जोड़ने की कोशिश में है.
सीटों के तालमेल को लेकर पेंच
उत्तर प्रदेश की सियासत में आगामी चुनावों को लेकर सपा और कांग्रेस गठबंधन के बीच सीटों के बंटवारे को लेकर रस्साकशी तेज हो गई है. लोकसभा चुनाव की सफलता से उत्साहित दोनों दल अब राज्य की चुनावी बिसात पर अपनी पकड़ मजबूत करने की होड़ में हैं, जिससे कई महत्वपूर्ण सीटों पर पेंच फंसता नजर आ रहा है. हालांकि कांग्रेस पार्टी की ओर से राहुल गांधी लगातार अपने उत्तर प्रदेश के सांसदों से जानकारी जुटा रहे हैं ताकि सपा के साथ किसी स्तर पर अलगाव की स्थिति न उत्पन्न हो जाए. चर्चा है कि सपा खुद को राज्य के मुख्य क्षेत्रीय दल के रूप में स्थापित रखते हुए बड़े भाई की भूमिका से पीछे हटने को तैयार नहीं है. इसलिए कांग्रेस के पसंद की ज्यादातर सीटों पर पेंच फंसा हुआ है .
पंजाब में मिशन 117 की तैयारी
पंजाब की राजनीतिक बिसात पर आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर एक नया और दिलचस्प समीकरण आकार ले रहा है, जहां एक तरफ भाजपा ने अकाली दल के साथ पुराने रिश्तों की अटकलों को विराम देते हुए राज्य की सभी 117 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने का शंखनाद कर दिया है. जबकि दूसरी तरफ सूबे की सत्ता से बाहर चल रही कांग्रेस पार्टी अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने के लिए पूरी ताकत झोंक रही है . पार्टी पारंपरिक वोट बैंक को सहेजने और आम आदमी पार्टी सरकार के खिलाफ बन रहे सत्ता विरोधी माहौल का फायदा उठाकर पंजाब की मुख्य राजनीतिक धुरी के रूप में खुद को दोबारा स्थापित करने की फिराक में है. कहा जा रहा है कि भाजपा का यह अकेला दांव असल में राज्य में एक स्वतंत्र और मजबूत राजनीतिक पहचान बनाने की दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा है. अकाली दल की छाया से बाहर निकलकर भाजपा जाट सिख चेहरों और अन्य दलों से आए कद्दावर नेताओं के दम पर एक नया सामाजिक समीकरण तैयार कर रही है, जो अब तक पंजाब में केवल एक शहरी पार्टी मानी जाती थी. वहीं कांग्रेस के लिए यह चुनाव साख की लड़ाई है, जहां उसे न केवल अंदरूनी गुटबाजी और कलह से पार पाना है, बल्कि किसानों की नाराजगी और युवाओं की बेरोजगारी जैसे स्थानीय मुद्दों को उठाकर जनता का भरोसा फिर से जीतना है. राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि शिरोमणि अकाली दल के बिखरते वजूद और आप सरकार के प्रशासनिक इम्तिहान के बीच, भाजपा और कांग्रेस की यह समानांतर कशमकश पंजाब के चुनावी मुकाबले को इस बार बहुकोणीय और बेहद अप्रत्याशित बनाने जा रही है.
इंडिया गठबंधन को एकजुट करने में जुटी कांग्रेस
संसद के हालिया मानसून सत्र में दिखाई दी विपक्षी एकजुटता को एक स्थायी स्वरूप देने के लिए कांग्रेस पार्टी अब बैकस्टेज डिप्लोमेसी में पूरी ताकत से जुट गई है. कांग्रेस नेतृत्व यह भली-भांति समझता है कि आगामी विधानसभा चुनावों और भविष्य की राजनीतिक चुनौतियों से निपटने के लिए इंडिया गठबंधन के बिखरते कुनबे को एक डोर में पिरोए रखना बेहद जरूरी है. कांग्रेस का प्रयास है कि तमाम मतभेदों को भुलाकर विभिन्न नीतिगत मुद्दों पर सरकार को घेरने के लिए एक सुर में आवाज उठाई जाए. संभवतः इसी वजह से कांग्रेसी रणनीतिकार इस बात को लेकर बेहद सतर्क है कि क्षेत्रीय स्तर पर होने वाली कोई भी खींचतान राष्ट्रीय स्तर के इस बड़े गठबंधन की नींव को कमजोर न कर दे. यही वजह है कि पार्टी अब राज्यों के कद्दावर क्षत्रपों के साथ सीधे और निरंतर संवाद की नीति अपना रही है, ताकि किसी भी विवाद को तूल पकड़ने से पहले ही आपसी सहमति से सुलझाया जा सके. कांग्रेस की कोशिश एक ऐसा न्यूनतम साझा कार्यक्रम और समन्वय समिति बनाने की है, जो गठबंधन के सहयोगियों के बीच भरोसे की कमी को दूर कर सके और जनता के बीच यह संदेश जाए कि यह मोर्चा केवल तात्कालिक स्वार्थों के लिए नहीं, बल्कि एक ठोस और दीर्घकालिक विमर्श के तहत एकजुट है.
