
जबलपुर। मप्र हाईकोर्ट ने ब्रिटेन में पारित विदेशी आर्बिट्रेशन अवार्ड के एग्जीक्यूशन को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि एक बार विदेशी आर्बिट्रेशन अवार्ड को मध्यस्थता व सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 47 और 48 के तहत लागू करने योग्य घोषित कर दिया जाता है, तो धारा-49 के तहत वह उसी हाईकोर्ट की डिक्री माना जाएगा और उसका एग्जीक्यूशन भी हाईकोर्ट में ही किया जा सकता है। जस्टिस विनय सराफ की एकलपीठ ने मित्तल एग्रीटेक प्राइवेट लिमिटेड की उस आपत्ति को निरस्त कर दिया, जिसमें अवार्ड को एग्जीक्यूशन के लिए जिला न्यायालय या अधीनस्थ अदालत भेजने की मांग की गई थी।
दरअसल मामला जीएएफटी के तहत 26 अगस्त 2022 को ब्रिटेन में पारित आर्बिट्रेशन अवार्ड से जुड़ा है। विवाद दो हजार मीट्रिक टन आर्गेनिक सोयाबीन की सप्लाई को लेकर राबर्ट मोशर ट्रांसपोर्ट इंक और मित्तल एग्रीटेक के बीच हुआ था। अवार्ड एकमात्र आर्बिट्रेटर जूली हाकिंस ने पारित किया था। एग्जीक्यूशन के दौरान मित्तल एग्रीटेक ने सीपीसी की धारा 38 और 39 का हवाला देकर मामले को जिला या सक्षम वाणिज्यिक न्यायालय भेजने की मांग की। वहीं, अवार्ड धारक की ओर से अधिवक्ता शिवांश सोनी ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि विदेशी अवार्ड के प्रवर्तन और एग्जीक्यूशन के लिए अलग-अलग कार्यवाही आवश्यक नहीं है। हाईकोर्ट ने माना कि एक ही कार्यवाही में पहले अवार्ड की प्रवर्तनीयता तय करने के बाद उसका एग्जीक्यूशन किया जा सकता है। इससे अनावश्यक मुकदमेबाजी से बचा जा सकता है। हालांकि, व्यावहारिक कठिनाई होने पर सीपीसी की धारा-39 के तहत डिक्री को सक्षम अदालत में भेजा जा सकता है। फिलहाल कोर्ट ने आदेश 21 के तहत एग्जीक्यूशन हाईकोर्ट में ही जारी रखने के निर्देश दिए।
