इंदौर: चीनी (शक्कर) के खुदरा दाम बढ़कर 60 से 70 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गए हैं. कुछ हफ्ते पहले तक जो शक्कर 42 से 45 रुपये प्रति किलो मिलती थी, उसके अचानक महंगे होने से आम परिवारों की परेशानी बढ़ गई है. पहले से ही महंगाई की मार झेल रहे परिवारों के लिए अब चीनी की बढ़ती कीमत ने रसोई का हिसाब बिगाड़ दिया है. सबसे ज्यादा दबाव उस परिवार पर पड़ेगा जिसकी आमदनी सीमित है.
मजदूर वर्ग के लिए रोज की कमाई से घर चलाना पहले ही चुनौती है. अब चाय, दूध, नाश्ता और बच्चों की जरूरतों में इस्तेमाल होने वाली चीनी पर अधिक रकम खर्च करनी पड़ रही है. नौकरीपेशा परिवारों को भी राशन के बजट में कटौती करनी पड़ सकती है. त्योहारों में मिठाई और पकवानों का खर्च अलग बढ़ेगा. सवाल है कि जब आमदनी उतनी ही है तो बढ़ते खर्च की भरपाई कैसे होगी? क्या परिवार दूसरी जरूरी चीजों में कटौती करेंगे या बचत खत्म कर रसोई चलाएंगे? चीनी की बढ़ती कीमत सिर्फ एक वस्तु का महंगा होना नहीं, बल्कि कमजोर होती घरेलू अर्थव्यवस्था का असर है.
यह बोले उपभोक्ता…
बढ़ती महंगाई से घर की रसोई संभालना, अब पहले जैसा आसान नहीं रहा. हर महीने सामान खरीदते समय बजट बिगड़ जाता है. चीनी महंगी होने से चाय-नाश्ता और त्योहारों की तैयारियों तक हर चीज का हिसाब बदलना पड़ेगा.
– करुणा बाई
कमाई सीमित है और खर्च लगातार बढ़ रहा है. राशन, बच्चों की पढ़ाई, बिजली और आने-जाने का खर्च पहले ही मुश्किल से निकलता है. अब चीनी जैसी रोजमर्रा की चीज महंगी होगी तो बचत करना और मुश्किल हो जाएगा.
– संजय साल्वे
महंगाई का असर सिर्फ बाजार तक नहीं रहता. सीधे घर की जरूरतों पर पड़ता है. मजदूर और मध्यमवर्गीय परिवार तय आय में पूरा महीना निकालते हैं. किसी भी सामान के दाम बढ़ने पर दूसरी जरूरत में कटौती करनी पड़ती है.
– इरशाद शाह
