
बालाघाट, आजादी के 80 वर्ष पूरे होने के बाद भी यदि किसी समुदाय के बच्चे बीमारी, कुपोषण, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी और सामाजिक पिछड़ेपन के बीच जिंदगी हार रहे हों, तो सवाल केवल उन परिवारों पर नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम पर उठता है। बालाघाट जिले के आदिवासी बाहुल्य बैहर क्षेत्र के वनांचल में बैगा बच्चों की मौतों ने इसी कड़वे सच को सामने ला दिया है।
बैगा समुदाय आज भी मुख्यधारा से इतना दूर क्यों है
करोड़ों रुपये खर्च करने के बावजूद बुनियादी सुविधाएं उनकी बस्तियों तक क्यों नहीं पहुंच पाईं? बैगा विकास प्राधिकरण के गठन के दशकों बाद भी जमीन पर बदलाव इतना कमजोर क्यों दिखाई देता है ।
कागजों पर विकास, जमीन पर जिंदगी की जद्दोजहद
बैगा समुदाय के बीच लंबे समय तक काम कर चुके सेवानिवृत्त शिक्षक मोहनलाल यादव बताते हैं कि उन्होंने अपने सेवाकाल में जागरूकता बढ़ाने के अनेक प्रयास किए, लेकिन सामाजिक झिझक, परंपराओं और अंधविश्वास के कारण बदलाव आसान नहीं रहा।
कई बैगा परिवार बाहरी लोगों से बातचीत करने में असहज महसूस करते हैं और स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर भी भय दिखाई देता है। इंजेक्शन और उपचार को लेकर आशंकाएं तथा झाड़-फूंक पर भरोसा कई बार आधुनिक चिकित्सा तक पहुंच में बाधा बन सकता है।
यह स्थिति केवल जागरूकता की कमी नहीं, बल्कि वर्षों से चली आ रही दूरी और विश्वास के संकट का परिणाम भी हो सकती है। सवाल यह है कि सरकारी स्वास्थ्य और जनजागरूकता अभियान इन परिवारों तक उनकी भाषा और सामाजिक परिवेश को समझते हुए कितने प्रभावी ढंग से पहुंचे?
झोपड़ियों में बचपन, जंगल से जिंदगी और 15-20 किलोमीटर दूर राशन
बैगा बहुल गांवों की तस्वीर विकास के दावों को आईना दिखाती है। कई परिवार घास-फूस, बांस, लकड़ी और तिरपाल से बने घरों में रहने को मजबूर हैं। कुछ परिवारों को प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ मिलने की बात सामने आती है, लेकिन अधूरे मकानों और निर्माण से जुड़ी शिकायतों की स्वतंत्र जांच जरूरी है।
कई परिवारों की जीवन-निर्भरता आज भी जंगल से मिलने वाले कंद-मूल, साग-भाजी और छोटी कृषि पर टिकी हुई है। बताया जाता है कि कुछ परिवार सरकारी राशन लेने के लिए 15-20 किलोमीटर तक पैदल सफर करते हैं। ऐसे हालात में बीमारी सिर्फ बीमारी नहीं रहती—वह गरीबी, दूरी, पोषण, परिवहन और स्वास्थ्य व्यवस्था की संयुक्त चुनौती बन जाती है।
बच्चों की मौत ने पूछा सबसे बड़ा सवाल—जिम्मेदार कौन?
बच्चों की मौतों के बाद अधिकारियों का बैगा बस्तियों तक पहुंचना निश्चित रूप से जरूरी है। लेकिन अब केवल सर्वे, बैठक और रिपोर्ट से आगे बढ़कर स्थायी समाधान की जरूरत है। जरूरत है कि प्रत्येक प्रभावित गांव में बच्चों के स्वास्थ्य, पोषण, टीकाकरण, स्वच्छ पेयजल, आवास, राशन और स्वास्थ्य सेवाओं की वास्तविक स्थिति का स्वतंत्र मूल्यांकन हो। साथ ही मौतों के वास्तविक चिकित्सकीय कारणों की पारदर्शी जांच हो और यदि कहीं लापरवाही, योजना में अनियमितता या संसाधनों की कमी सामने आती है तो जवाबदेही भी तय की जाए।
बैगा समुदाय को विकास की मुख्यधारा में लाने का अर्थ उनकी संस्कृति मिटाना नहीं, बल्कि उनकी संस्कृति का सम्मान करते हुए उन्हें स्वास्थ्य, शिक्षा, पोषण, आवास और सम्मानजनक जीवन का अधिकार दिलाना है।
आज अधिकारी गांवों में पहुंचकर पूछ रहे हैं आप ऐसा जीवन क्यों जी रहे हैं शायद अब समय है कि सवाल बैगा परिवारों से नहीं, उस व्यवस्था से पूछा जाए जिसने 80 वर्षों में भी उनके दरवाजे तक विकास की रोशनी पूरी तरह नहीं पहुंचने दी।
