सुप्रीम कोर्ट ने फांसी को दर्द रहित वैकल्पिक तरीकों से बदलने की याचिका खारिज की

नयी दिल्ली, 18 अगस्त (वार्ता) उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को फांसी के जरिए मौत की सजा देने के प्रावधान को खत्म करने और इसके स्थान पर कम दर्दनाक तरीका अपनाने की मांग करने वाली करीब नौ वर्ष पुरानी याचिका को खारिज कर दिया।

न्यायालय ने हालांकि यह साफ कर दिया कि यदि भविष्य में वैज्ञानिक, चिकित्सा या व्यावहारिक साक्ष्यों के आधार पर यह साबित होता है कि फांसी की संवैधानिक वैधता का आधार बदल चुका है, तो यह फैसला भविष्य की संवैधानिक समीक्षा के रास्ते में बाधा नहीं बनेगा।

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने 23 सितंबर 1983 के ‘दीना बनाम भारत संघ’ मामले में तीन न्यायाधीशों की पीठ के उस फैसले को बड़ी पीठ के पास पुनर्विचार के लिए भेजने से इनकार कर दिया, जिसने फांसी के जरिये मृत्युदंड को बरकरार रखा था।

वर्ष 1983 का वह फैसला तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश वाई.वी. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने सुनाया था, जिसमें न्यायमूर्ति आरएस पाठक और न्यायमूर्ति सब्यसाची मुखर्जी शामिल थे।

पीठ ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि ऐसा कोई आधार नहीं पाया गया, जिससे ‘दीना’ मामले में तीन न्यायाधीशों की पीठ के फैसले और सीआरपीसी की धारा 354(5)/बीएनएसएस की धारा 393(5) की संवैधानिक वैधता पर पुनर्विचार के लिए इसे बड़ी पीठ को भेजा जाये।

न्यायमूर्ति संदीप मेहता ने स्पष्ट किया कि इस याचिका के खारिज होने का मतलब भविष्य की संवैधानिक समीक्षा के दरवाजे बंद होना नहीं है। यदि भविष्य में ऐसे ठोस वैज्ञानिक, चिकित्सीय या व्यावहारिक प्रमाण सामने आते हैं, जो पूर्व फैसले के वैज्ञानिक आधार को बदलते हैं, तो इस पर दोबारा विचार हो सकता है।

न्यायालय ने कहा कि संविधान की व्याख्या एक जीवंत प्रक्रिया है और इसे संवैधानिक सिद्धांतों व वैज्ञानिक ज्ञान के विकास के साथ तालमेल बनाये रखना चाहिए।

न्यायालय ने भविष्य में ठोस वैज्ञानिक या मेडिकल साक्ष्य सामने आने पर इस संवैधानिक मुद्दे को पुनर्विचार के लिए खुला रखा है। पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि संविधान को जीवंत रूप से समझा जाना चाहिए और वैज्ञानिक प्रगति के अनुसार प्रतिक्रिया देनी चाहिए। इसके साथ ही उच्चतम न्यायालय ने केंद्र सरकार को मृत्युदंड के मौजूदा तरीके की व्यापक वैज्ञानिक समीक्षा करने की छूट भी दी है।

न्यायालय ने टिप्पणी की कि यदि केंद्र सरकार उचित समझे, तो वह कानून, फॉरेंसिक मेडिसिन, न्यूरोसाइंस, अपराधशास्त्र और संबंधित विषयों के विशेषज्ञों की एक संस्था गठित कर सकती है। यह संस्था इस बात की जांच कर सकती है कि क्या फांसी का कोई ऐसा वैकल्पिक तरीका मौजूद है, जो मौत की सजा पाने वाले कैदी की गरिमा बनाये रखते हुए अनावश्यक दर्द को कम करने के संवैधानिक उद्देश्य को बेहतर ढंग से पूरा करता हो।

पीठ ने अपने फैसले में कहा कि यह पूरी प्रक्रिया पूरी तरह से कार्यपालिका और विधायिका के अधिकार क्षेत्र में आती है और इसे भविष्य के वैज्ञानिक व तकनीकी विकास के आलोक में नीतिगत फैसले के रूप में अपनाया जा सकता है।

यह याचिका वर्ष 2017 में अधिवक्ता ऋषि मल्होत्रा के दायर की गयी थी, जिसमें दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 354(5) को चुनौती दी गयी थी, जिसमें प्रावधान है कि मृत्युदंड पाने वाले व्यक्ति को ‘गर्दन से तब तक लटकाया जाये जब तक कि उसकी मृत्यु न हो जाये’। यही प्रावधान अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 393(5) में शामिल है।

याचिकाकर्ता ऋषि मल्होत्रा ने तर्क दिया था कि फांसी देना क्रूर है और अनुच्छेद 21 के तहत मिलने वाले गरिमा के अधिकार के खिलाफ है। इसलिए मौत की सजा देने के लिए वैकल्पिक तरीकों पर विचार किया जाना चाहिए।

मार्च 2023 की एक पिछली सुनवाई के दौरान उच्चतम न्यायालय ने केंद्र सरकार से फांसी के प्रभाव, इसमें होने वाले दर्द, मृत्यु में लगने वाले समय और वैकल्पिक तरीकों पर वैज्ञानिक डेटा मांगा था। तब न्यायालय ने संकेत दिया था कि 1983 के फैसले पर पुनर्विचार से पहले पर्याप्त वैज्ञानिक सामग्री की आवश्यकता होगी और एक विशेषज्ञ समिति के गठन पर भी विचार किया जा सकता है।

 

 

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