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देहरादून, उत्तराखंड में मानसून का आधा सफर पूरा हो चुका है, लेकिन मौसम का बदलता पैटर्न राहत की बजाय चिंता बढ़ा रहा है। प्रदेश में कुछ जिलों में सामान्य से कई गुना अधिक बारिश दर्ज की गई है, जबकि कई जिले सूखे रह गए। विशेषज्ञों का कहना है कि बीते वर्षों के आंकड़े बताते हैं कि अगस्त-सितंबर में होने वाली बारिश सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाती है।
*जिलों में असमान बारिश से बढ़ा खतरा*
मौसम विभाग के आंकड़ों के अनुसार अगस्त के पहले दो हफ्तों में प्रदेश में 177 मिमी बारिश हुई, जो सामान्य से 8% कम है। लेकिन जिलावार तस्वीर अलग है।
बागेश्वर में 290.5 मिमी बारिश दर्ज हुई, जो सामान्य से 158% अधिक है। चमोली में 204.7 मिमी बारिश हुई, जो 70% ज्यादा है। हरिद्वार में 232.2 मिमी बारिश हुई, जो सामान्य से 46% अधिक है। देहरादून में भी बारिश 5% ज्यादा रही।
*कम समय में तेज बारिश पहाड़ों के लिए घातक*
आपदा प्रबंधन अधिकारियों के अनुसार आपदा का खतरा सिर्फ कुल बारिश से नहीं, बल्कि कम समय में होने वाली अत्यधिक बारिश से तय होता है। इससे पहाड़ी ढलान कमजोर होती हैं, नाले-नदियां उफान पर आती हैं और लैंडस्लाइड व फ्लैश फ्लड का खतरा बढ़ जाता है।
*पिछले साल अगस्त-सितंबर में मची थी तबाही*
2025 में अगस्त में उत्तरकाशी के धराली में बादल फटने से भारी मलबा और पानी बस्तियों में घुस गया था। सितंबर में देहरादून के सहस्रधारा-मालदेवता क्षेत्र में नदियां उफानीं और कई पुल-सड़कें क्षतिग्रस्त हुईं। चमोली के नंदानगर में भी कुछ घंटों की बारिश में मकान प्रभावित हुए थे।
2024 में टिहरी के घनसाली में बादल फटने और केदारनाथ मार्ग पर भूस्खलन हुआ था। 2023 में गौरीकुंड में बारिश-भूस्खलन से जान गईं, जबकि 2021 में अक्टूबर की बारिश ने बड़े पैमाने पर नुकसान किया था।
*”मानसून का आखिरी दौर सबसे संवेदनशील”*
पर्यावरणविद् प्रो. एसपी सती का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण बारिश का चक्र बदल रहा है। मौसम केंद्र देहरादून के निदेशक सीएस तोमर ने भी माना कि इस बार बारिश का वितरण एकसमान नहीं रहा।
अब तक इस मानसून सीजन में प्रदेश में 743.9 मिमी बारिश हुई है, जो सामान्य से 5% कम है। जून में 37% कम, जुलाई में 9% अधिक और अगस्त में अब तक असमान बारिश दर्ज की गई है।
अधिकारियों का कहना है कि बागेश्वर, चमोली, हरिद्वार और देहरादून जैसे जिलों में मौसम अलर्ट को गंभीरता से लेने की जरूरत है, क्योंकि अधिक बारिश वाले क्षेत्रों में जमीन में नमी और ढलानों के कमजोर होने से संवेदनशीलता बढ़ गई है।