इंदौर: इंदौर को यूं ही नहीं फूड कैपिटल भी कहा जाता है. पोहे-जलेबी और समोसे-कचौरी के बाद यदि कोई नाश्ता इंदौरियों की जुबां पर जगह बना पाया है तो वह है कढ़ी-फ़ाफड़े. रामबाग स्थित श्री कृष्णा गुजराती दुकान के कढ़ी फाफड़े 35 वर्षो से लोगो की जुबां पर कब्जा जमाए हुए है. बच्चों से बुजुर्ग तक सुबह-शाम बेसन से बने फाफड़े और सैकड़ों लीटर कढ़ी बड़े चाव से चट कर जाते हैं.
दुकान की शुरूआत राजस्थान के राजसमंद जिले से काम की तलाश में इंदौर आए रामचंद्र कुमावत ने की थी. आज उनकी तीसरी पीढ़ी कढ़ी फाफड़े परोस रही है. 3 रुपए प्लेट से शुरू हुआ सफर आज 35 रुपए प्लेट पर पहुंच गया है. संचालक रामचंद्र कुमावत के बेटे नीरज ने बताया कि पिता काम की तलाश में इंदौर आए तो देखा कि पोहे-जलेबी और समोसे-कचौरी के अलावा कोई दूसरा नाश्ता नहीं चलता है. उन्हें ख्याल आया कि इंदौरियो की जुबां के टेस्ट को बदला जाए. वे कढ़ी-फाफड़े सीखने अहमदाबाद गए. एक दुकान पर तीन महीने कढ़ी-फाफड़े बनाना सीखे और इंदौर लौटकर कढ़ी फाफड़े बेचने की शुरुआत की. शुरुआत में लगा कि इंदौरी पोहे छोड़कर कोई दूसरा नाश्ता नहीं खाएंगे लेकिन धीरे-धीरे मां अन्नपूर्णा के आशीर्वाद से लोगों को कढ़ी फाफड़े का स्वाद पसंद आया. नीरज ने कहा कि रोज 1200 प्लेट कढ़ी फाफड़े की बिक्री है. 500 लीटर कढ़ी और 35 क्विंटल बेसन से बने फाफड़े लोग बड़े चाव से स्वाद लेकर खाते है. देवास, उज्जैन, धार व आसपास के जिलों के लोग भी कढ़ी फाफड़े खाने आते हैं.
खट्टी-मीठी कढ़ी का दीवाना
चाव के साथ कढ़ी पी रहे राजेश गौड़ ने बताया कि 25 वर्ष से कढ़ी फाफड़े खाने आ रहे हैं. इनकी खट्टी मीठी कढ़ी का दीवाना हूं. वर्षों से वही टेस्ट बरकरार है.
हफ्ते में दो-तीन बार आता हूं
बाणगंगा निवासी जय यादव के मुताबिक कढ़ी फाफड़े का नाश्ता हफ्ते में 2-3 बार हो जाता है. टेस्ट इतना बढ़िया है की दूर से भी खाने आ जाता हूं.
फाफड़े में गुजरात का टेस्ट
संतोष राय कहते है कि मुझे फाफड़े बहुत पसंद है. खाने के दौरान लगता है मानो गुजरात में बैठकर फाफड़े का आनंद ले रहे हो.
