
बालाघाट, सरकारी संपत्तियों के संरक्षण को लेकर बड़े-बड़े दावे करने वाला जनजातीय कार्य विभाग स्वयं अपनी करोड़ों रुपये की परिसंपत्तियों को बचाने में गंभीर नजर नहीं आ रहा है। परसवाड़ा का पुराना सांदीपनि विद्यालय इसका ताजा उदाहरण बन गया है, जहां जून माह में आए आंधी-तूफान में उड़ गए प्राथमिक कक्षाओं के टीन शेड आज भी नहीं लगाए गए हैं। दो माह से अधिक समय बीत जाने के बावजूद विभाग ने क्षतिग्रस्त भवन की मरम्मत तक कराना उचित नहीं समझा, जिससे लाखों रुपये खर्च कर तैयार किए गए कक्ष कुदरत की मार और लापरवाही दोनों का शिकार बन रहे हैं।
जून माह में आए तेज आंधी-तूफान ने पूरे परसवाड़ा क्षेत्र में भारी नुकसान पहुंचाया था। कई व्यापारियों के शेड उड़ गए, ग्रामीणों के मकानों की छतें क्षतिग्रस्त हुईं, जगह-जगह पेड़ धराशायी हो गए और जनजीवन अस्त-व्यस्त हो गया। इसी दौरान ट्राइबल विभाग के अधीन संचालित पुराने सांदीपनि विद्यालय की प्राथमिक कक्षाओं पर लगे टीन शेड भी उड़ गए। परिसर में खड़ा विशाल आम का पेड़ मंच के समीप बने भवन पर गिर गया, जिसे विभाग ने तत्काल हटवा तो दिया, लेकिन सबसे जरूरी कार्य—उड़ी हुई छतों की मरम्मत—आज तक अधूरा पड़ा है।
विडंबना यह है कि जिन कक्षाओं को लाखों रुपये खर्च कर आधुनिक सुविधाओं से तैयार किया गया था, वे अब बारिश, धूप और उपेक्षा की मार झेल रही हैं। कमरों में लगाए गए ग्रीन बोर्ड, विद्युत बोर्ड, केबल वायरिंग, शिक्षण सामग्री तथा अन्य संसाधन खुले वातावरण में खराब हो रहे हैं। कहीं सामान टूट रहा है तो कहीं असामाजिक तत्व उसे चोरी कर ले जा रहे हैं। करोड़ों की सरकारी संपत्ति धीरे-धीरे कबाड़ में तब्दील होती दिखाई दे रही है।
विद्यालय के नए भवन में स्थानांतरण के बाद पुराने परिसर को खाली कर जनजातीय कार्य विभाग के सुपुर्द कर दिया गया था। शिक्षकों के अनुसार भवन और उसकी देखरेख की पूरी जिम्मेदारी विभाग की है। कुछ इलेक्ट्रॉनिक उपकरण विभागीय कर्मचारियों के संरक्षण में रखे गए हैं, लेकिन भवन के संरक्षण और रखरखाव को लेकर कोई गंभीर पहल दिखाई नहीं दे रही।
स्थानीय मीडिया द्वारा हाल ही में किए गए निरीक्षण में सामने आया कि प्राथमिक कक्षाओं के उड़े हुए टीन शेड अब भी नहीं लगाए गए हैं। परिसर में बिखरी वायरिंग, खुले पड़े विद्युत बोर्ड, टूटते निर्माण और जर्जर होती कक्षाएं साफ बता रही हैं कि जिम्मेदार अधिकारियों ने महीनों से यहां झांकना भी जरूरी नहीं समझा। बताया जाता है कि पूरे परिसर को पहले सीसीटीवी कैमरों से लैस किया गया था, लेकिन विद्यालय के विस्थापन के दौरान कैमरे भी निकाल लिए गए, फर्नीचर हटा दिया गया । इसके बाद भवन पूरी तरह असुरक्षित हो गया, जिससे चोरी और तोड़फोड़ की घटनाओं की आशंका लगातार बढ़ गई है।
कभी परसवाड़ा और आसपास के ग्रामीण अंचलों के हजारों विद्यार्थियों के भविष्य को संवारने वाला यह विद्यालय आज स्वयं बदहाली का प्रतीक बन गया है। जिस भवन पर करोड़ों रुपये की सार्वजनिक राशि खर्च हुई, वही भवन अब विभागीय उदासीनता के कारण मरणासन्न स्थिति में पहुंच रहा है। यदि समय रहते संरक्षण नहीं किया गया तो आने वाले वर्षों में यह उपयोगी शासकीय परिसंपत्ति खंडहर में तब्दील हो सकती है।
क्षेत्र के जागरूक नागरिकों का कहना है कि जनजातीय कार्य विभाग को तत्काल संज्ञान लेते हुए क्षतिग्रस्त टीन शेड की मरम्मत, भवन का संरक्षण और सुरक्षा व्यवस्था बहाल करनी चाहिए। लाखों रुपये की लागत से निर्मित कक्षाओं को बचाना केवल विभागीय जिम्मेदारी ही नहीं, बल्कि जनता के टैक्स से निर्मित सरकारी संपत्ति की रक्षा का भी प्रश्न है। यदि अब भी लापरवाही जारी रही तो करोड़ों रुपये की यह परिसंपत्ति धीरे-धीरे पूरी तरह बर्बाद हो जाएगी और इसकी जवाबदेही तय करना भी कठिन हो जाएगा।
