
शाजापुर, पर्यावरण संरक्षण के नाम पर जब मंच सजते हैं, तो हर कोई एक पौधा रोपकर अपनी तस्वीर वायरल कराने की होड़ में दिखता है. एक पेड़ मां के नाम जैसी भावुक और पवित्र मुहिम से पूरे देश को यह उम्मीद थी कि हम अपनी धरती और आने वाली पीढिय़ों को एक हरा-भरा भविष्य देंगे, लेकिन शाजापुर में ट्रेक्टर पर लदी लकडिय़ों की तस्वीरें एक भयावह और कड़वी हकीकत बयां कर रही हैं. एक तरफ जहां मां के नाम पर कागजों और अभियानों में पौधे रोपे जा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ लकड़ी माफिया खुलेआम हरियाली पर कुल्हाड़ी चला रहे हैं. ऐसा नहीं कि जिम्मेदारों को इसकी भनक नहीं है, बल्कि हकीकत तो यह है कि वे हरी पत्तियां गिनकर मौनी बाबा बने बैठे हैं.
शाजापुर में हर दिन दर्जनों हरे-भरे पेड़ काटे जा रहे हैं. ये केवल लकड़ी के तने नहीं हैं, बल्कि क्षेत्र के पर्यावरण और पारिस्थितिकी तंत्र की रीढ़ है. लेकिन सबसे ज्यादा डरावनी बात पेड़ों की कटाई नहीं, बल्कि इस विनाश पर फैली प्रशासन और समाज की सन्नाटे भरी चुप्पी है. यह मुमकिन ही नहीं है कि दिनदिहाड़े सैकड़ों कुल्हाडिय़ां चलें, ट्रैक्टर-ट्रॉली भरकर लकडिय़ां शहर से बाहर जाएं और वन विभाग या स्थानीय प्रशासन को इसकी भनक तक न हो. माफियाओं के हौसले इसलिए बुलंद हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि इस चुप्पी की एक तय कीमत चुका दी गई है. यही कारण है कि रात 11 बजे से 2 बजे तक बेरछा रोड, हाट मैदान, मुरादपुर रोड और कॉलेज के सामने नहर मार्ग पर तिरपाल से ढंके लकड़ी से भरे ट्रैक्टर-ट्रॉली धड़ल्ले से लकडिय़ों का अवैध परिवहन कर रहे हैं. इतना ही नहीं लालबाई-फूलबाई माता मंदिर रोड, मुरादपुर रोड और बिजाना बायपास क्षेत्र के खाली प्लॉटों व झाडिय़ों में बड़ी मात्रा में लकड़ी छिपाकर रखी जा रही है. ऐसे में सवाल यह है कि नियमित गश्त के बावजूद इतना बड़ा अवैध भंडारण और अवैध परिवहन वन विभाग और जिला प्रशासन की नजर से कैसे बच सकता है.
कागजों में पौधारोपण, हकीकत में कटाई…
प्रशासन अभियानों के तहत पौधे लगाकर अपनी उपलब्धि के आंकड़े तो पूरे कर लेता है, लेकिन एक नया पौधा कभी भी 50 साल पुराने बरगद, नीम या पीपल के पेड़ का विकल्प नहीं बन सकता, जो हर दिन सैकड़ों लीटर ऑक्सीजन देता है और हजारों पक्षियों का आशियाना होता है. शाजापुर के आम नागरिक भी अक्सर इस अवैध कारोबार को देखकर अनदेखा कर देते हैं. जब तक कटाई किसी के अपने घर के आंगन में न हो, तब तक लोग इसे दूसरों की समस्या मानकर चुप रहते हैं. सबसे बड़ी विडंबना है कि वन विभाग की दीवारों पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा है वन है तो जल है, जल है तो कल है, पेड़-पौधे मत करो नष्ट, सांस लेने में होगा कष्ट, वृक्ष बिना न बादल बरसे, बिन पानी सब प्राणी तरसे, लेकिन इन्हीं नारों की छाया में पेड़ों की अवैध कटाई और लकड़ी का कारोबार फल-फूल रहा है.
राजस्व विभाग ने 14 आरा मशीन सील की
नवभारत द्वारा लकड़ी माफियाओं के खिलाफ लगातार समाचार प्रकाशित किए जा रहे हैं. साथ ही अवैध लकड़ी परिवहन के वीडियो भी जिला प्रशासन को उपलब्ध कराए गए. इसी का असर रहा कि गुरुवार को एसडीएम मनीषा वास्कले के निर्देश पर 14 आरा मशीनों को सील किया गया. बताया जा रहा है कि प्रशासन द्वारा की गई इस कार्यवाही में वन विभाग ने कोई सहयोग नहीं किया. जिला प्रशासन द्वारा आरा मशीनों को सील करने के साथ ही संचालकों को चेतावनी दी गई है कि यदि लकड़ी के अवैध भंडारण या परिवहन में संलिप्तता पाई जाती है, तो वैधानिक कार्यवाही की जाएगी.
