
नयी दिल्ली, 5 अगस्त (वार्ता) रेटिंग एजेंसी क्रिसिल ने भारतीय रिजर्व बैंक के बुधवार को घोषित मौद्रिक नीति संबंधी निर्णयों और अनुमानों को बाजार के अनुकूल बताते हुए कहा कि आरबीआई की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) ” अनिश्चित मौसम और भू-राजनीतिक परिस्थितियों के बीच लचीलापन बनाए रखेगी।” क्रिसिल ने चालू वित्त वर्ष के लिए जीडीपी वृद्धि दर 6.6 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया है जो पिछले वर्ष के 7.7 प्रतिशत की तुलना में कम है। इसका प्रमुख कारण उत्पादकों पर बढ़ता लागत दबाव तथा वैश्विक व्यापार में व्यवधान हैं, जिनसे निर्यात की संभावनाएं प्रभावित हो रही हैं। इसके अतिरिक्त, सामान्य से कम वर्षा का कृषि उत्पादन और ग्रामीण मांग पर पड़ने वाला संभावित प्रभाव भी आर्थिक वृद्धि के लिए एक महत्वपूर्ण जोखिम बना हुआ है।
आरबीआई के बयान में जीडीपी वृद्धि दर 6.7 प्रतिशत और खुदरा मुद्रास्फीति 5 प्रतिशत के स्तर पर रहने का अनुमान लगाया गया है। एस एंड पी की आनुषंगी क्रिसल ने आरबीआई की घोषणाओं पर अपनी विस्तृत प्रति कहा, ” मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) द्वारा नीतिगत दरों को यथावत रखने का निर्णय हमारी अपेक्षाओं के अनुरूप रहा। हालांकि, जून में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) आधारित मुद्रास्फीति आरबीआई के 4 प्रतिशत के लक्ष्य से ऊपर पहुंच गई, लेकिन कोर (विनिर्मित वस्तुओं वाली) मुद्रास्फीति अपेक्षाकृत नियंत्रित रही है। इससे संकेत मिलता है कि फिलहाल महंगाई का दबाव व्यापक स्तर पर नहीं फैला है।” क्रिसिल ने कहा है कि इसके बावजूद, अल नीनो के प्रभाव के बीच आगे बढ़ रहे मानसून की स्थिति पर करीबी नजर बनाए रखने की आवश्यकता है। वहीं, पश्चिम एशिया की भू-राजनीतिक परिस्थितियां अभी भी अनिश्चित बनी हुई हैं, हालांकि पिछली मौद्रिक नीति बैठक की तुलना में जिंस (कमोडिटी) कीमतों में कुछ नरमी आई है।
क्रिसिल का अनुमान है कि “चालू वित्त वर्ष में सीपीआई आधारित मुद्रास्फीति बढ़कर 5.1 प्रतिशत तक पहुंच सकती है, जबकि सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर घटकर 6.6 प्रतिशत रहने की संभावना है।’ रेटिंग एजेंसी ने कहा है, ‘ वृद्धि और मुद्रास्फीति के बीच इस संतुलन को देखते हुए हमारा मानना है कि एमपीसी नीतिगत दरों के संबंध में लचीला दृष्टिकोण अपनाएगी और महंगाई से जुड़े जोखिमों पर लगातार नजर रखेगी।
” एजेंसी ने यह भी कहा है, “हमें लगता है कि आने वाले समय में उत्पादक अपनी बढ़ती लागत का बोझ धीरे-धीरे खुदरा कीमतों में स्थानांतरित करेंगे। इसके अलावा, चालू वित्त वर्ष की दूसरी छमाही में वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) में दी गई कटौतियों का प्रभाव कम होने के साथ मुद्रास्फीति में और तेजी आ सकती है।” क्रिसिल के विश्लेषण के अनुसार मानसून आर्थिक परिदृश्य को प्रभावित करने वाला एक महत्वपूर्ण कारक रहेगा। जुलाई में वर्षा की कमी कुछ कम जरूर हुई, लेकिन 4 अगस्त तक यह सामान्य से 12 प्रतिशत कम दर्ज की गई। अरहर (तूर), मोटे अनाज और तिलहन जैसी फसलों पर दबाव बना हुआ है। हालांकि, हाल के वर्षों में खाद्य कीमतों को नियंत्रित करने के लिए सरकार द्वारा आपूर्ति पक्ष से किए गए हस्तक्षेप बढ़े हैं और इनके प्रभाव पर भी नजर रखी जाएगी।
