इंदौर: 21 वीं सानंद नाट्य स्पर्धा में मंगलवार को वेल एन वेल सोसायटी ने मराठी नाटक महामाता का अविस्मरणीय मंचन किया. दरअसल, कुछ विषय ऐसे होते हैं जिन पर चर्चा करना जितना कठिन होता है, उन्हें रंगमंच पर संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत करना उससे कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण होता है। इच्छामृत्यु ऐसा ही एक विषय है, जो आज विश्वभर में नैतिक, मानवीय और चिकित्सकीय बहस का केंद्र बना हुआ है. बढ़ती आयु, असाध्य रोग, दुर्घटनाओं से उत्पन्न स्थायी विकलांगता और असहनीय शारीरिक पीड़ा, इन परिस्थितियों में जीवन और मृत्यु के बीच खड़े मनुष्य की दुविधा को नाटक महामाता अत्यंत मार्मिकता और गहन संवेदना के साथ अभिव्यक्त करता है.
प्रख्यात साहित्यकार वाचस्पती गो. श्री. बनहट्टी ने इस नाटक के माध्यम से केवल इच्छामृत्यु का प्रश्न नहीं उठाया, बल्कि मातृत्व, करुणा, त्याग और मानवीय विवशता की उन परतों को भी उद्घाटित किया है, जहां कोई निर्णय सही या गलत नहीं रह जाता, बल्कि केवल पीड़ा शेष रह जाती है। उनका लेखन कहीं भी उपदेशात्मक नहीं बनता, बल्कि दर्शकों को आत्ममंथन के लिए विवश करता है. नाटक का केंद्र है सेना का अधिकारी अविनाश, जो एक वायु दुर्घटना के बाद स्थायी रूप से विकलांग हो जाता है. अपने उज्ज्वल भविष्य को अंधकार में डूबता देखकर वह स्वयं को ‘जीवित लाश’ के रूप में देखने लगता है. जीवन उसके लिए संघर्ष नहीं, बल्कि असहनीय यातना बन जाता है. अंततः वह इच्छामृत्यु का निर्णय लेता है और इस निर्णय को पूरा करने के लिए अपनी जन्मदात्री मां से सहायता मांगता है. यहीं से नाटक अपने सबसे मार्मिक और हृदयविदारक मोड़ पर पहुंचता है. एक मां, जिसने बेटे को जन्म दिया, वही उसे मृत्यु की ओर विदा करने की असहनीय पीड़ा अपने भीतर समेटती है. यह दृश्य दर्शकों के मन को भीतर तक झकझोर देता है.
दिग्दर्शक श्रीकांत भोगले ने इस अत्यंत संवेदनशील विषय को उल्लेखनीय परिपम्ता और कलात्मक संयम के साथ मंच पर साकार किया है. महामाता केवल एक पारिवारिक कथा नहीं है, बल्कि यह जीवन के अधिकार, मृत्यु की गरिमा, चिकित्सा नैतिकता और मानवीय संवेदनाओं पर गंभीर विमर्श प्रस्तुत करने वाला नाटक है. इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि यह किसी निष्कर्ष को थोपता नहीं, बल्कि दर्शकों को स्वयं विचार करने का अवसर देता है. यह नाटक केवल देखा नहीं जाता, बल्कि महसूस किया जाता हैऔर यही किसी श्रेष्ठ रंगकृति की सबसे बड़ी पहचान है। इंदौर के वरिष्ठ रंगकर्मी श्रीकांत भोगले जितने अच्छे दिग्दर्शक हैं। उतने ही बेहतरीन अभिनेता भी हैं। उन्होंने इस नाटक में अभिनय भी किया है। अन्य सभी कलाकारों ने भी प्रभावी अभिनय किया.
