
सुसनेर, एक ओर सरकार प्रदेश में उच्च शिक्षा और अधोसंरचना विकास के बड़े-बड़े दावे कर रही है, वहीं दूसरी ओर लाखों रुपए की लागत से बनी स्वामी विवेकानंद महाविद्यालय की नई बिल्डिंग महज चार वर्ष के भीतर ही क्षतिग्रस्त होने लगी है. करीब 353.09 लाख रुपए की लागत से निर्मित इस भवन में जगह-जगह दरारें, प्लास्टर उखडऩे और अन्य निर्माण संबंधी खामियां सामने आने से निर्माण एजेंसी, ठेकेदार और जिम्मेदार अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो गए हैं.
जानकारी के अनुसार, इस भवन का लोकार्पण उस समय किया गया था, जब प्रदेश के वर्तमान मुख्यमंत्री उच्च शिक्षा मंत्री के पद पर थे. करोड़ों रुपए खर्च कर बनाई गई इस महत्वाकांक्षी परियोजना से वर्षों तक सुरक्षित और गुणवत्तापूर्ण उपयोग की उम्मीद की जा रही थी, लेकिन लोकार्पण के कुछ ही वर्षों बाद भवन की स्थिति चिंताजनक बताई जा रही है. विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी बड़े सरकारी भवन का निर्माण इस प्रकार किया जाता है कि वह कई दशकों तक सुरक्षित रहे. यदि चार वर्ष के भीतर ही भवन में क्षति दिखाई देने लगे, तो यह सामान्य स्थिति नहीं मानी जा सकती. ऐसे में निर्माण सामग्री की गुणवत्ता, तकनीकी मानकों का पालन और निर्माण कार्य की निगरानी पर गंभीर प्रश्न उठना स्वाभाविक है. स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि समय रहते इसकी निष्पक्ष तकनीकी जांच नहीं कराई गई, तो भविष्य में यह भवन और अधिक क्षतिग्रस्त हो सकता है, जिससे सरकारी संपत्ति को नुकसान के साथ-साथ लोगों की सुरक्षा पर भी खतरा उत्पन्न हो सकता है.
लाखों रुपए खर्च, फिर भी गुणवत्ता पर सवाल
इतनी बड़ी राशि खर्च होने के बावजूद भवन का अल्प समय में क्षतिग्रस्त होना इस बात की ओर संकेत करता है कि कहीं न कहीं निर्माण प्रक्रिया में गंभीर लापरवाही हुई है. यदि निर्माण कार्य निर्धारित गुणवत्ता के अनुरूप हुआ होता, तो इतनी जल्दी भवन में दरारें और अन्य क्षतियां सामने नहीं आतीं. लोगों का कहना है कि यदि सरकारी भवनों का यही हाल रहेगा, तो जनता के टैक्स का पैसा आखिर कैसे सुरक्षित रहेगा. लाखों रुपए की परियोजना पर उठ रहे सवालों का जवाब संबंधित विभाग और निर्माण एजेंसी को देना चाहिए.
सवालों का कौन देगा जवाब…
353.09 करोड़ रुपए की परियोजना चार साल में ही क्षतिग्रस्त कैसे हो गई?
क्या निर्माण कार्य में गुणवत्ता से समझौता किया गया?
निर्माण सामग्री और तकनीकी मानकों की जांच किसने की थी?
भवन का गुणवत्ता परीक्षण कब और किस एजेंसी ने किया?
यदि लापरवाही हुई है, तो जिम्मेदार अधिकारियों और ठेकेदारों पर क्या कार्रवाई होगी?
क्या सरकार इस पूरे मामले की उच्च स्तरीय तकनीकी जांच कराएगी?
क्षतिग्रस्त बिल्डिंग की होगी जांच या फिर अंधेर नगरी चौपट राजा वाला काम चलता रहेगा?.
यदि लापरवाही हुई है, तो जिम्मेदार अधिकारियों और ठेकेदारों पर क्या कार्रवाई होगी?
क्या सरकार इस पूरे मामले की उच्च स्तरीय तकनीकी जांच कराएगी?
क्षतिग्रस्त बिल्डिंग की होगी जांच या फिर अंधेर नगरी चौपट राजा वाला काम चलता रहेगा?
क्या होगी जिम्मेदारों पर कार्यवाही ?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि जांच में निर्माण कार्य में अनियमितता या लापरवाही सामने आती है, तो क्या संबंधित ठेकेदार, निर्माण एजेंसी, इंजीनियर और निगरानी करने वाले अधिकारियों पर कठोर कार्रवाई होगी या फिर मामला केवल जांच और कागजी खानापूर्ति तक सीमित रह जाएगा. पूर्व में भी कई मामलों में जांच की घोषणा तो हुई, लेकिन कार्रवाई के नाम पर केवल लीपापोती होने के आरोप लगते रहे हैं. ऐसे में इस मामले में भी लोग पारदर्शी जांच और दोषियों के विरुद्ध सख्त कार्रवाई की मांग कर रहे हैं.
