मासूम का बचपन संवारने निकले बड़ोदियावासी, अब सरकार की बारी

मोहन बड़ोदिया, न खाने को खाना है, न रहने के लिए छत है, जिसने जहां जो दे दिया, वह ले लिया, लेकिन पढऩे की ऐसी लालसा कि उसका हर दुख किताबों के आगे फीका है, जिसकी लगन को देखते हुए शासकीय विद्यालय के प्रधानाध्यापक ने उसे अपने विद्यालय में प्रवेश दे दिया. उसका जन्म प्रमाण-पत्र, समग्र आईडी है, लेकिन आधार कार्ड नहीं बन पा रहा है. आधार कार्ड नहीं बन पाने के पीछे उसका डिजिटल जन्म प्रमाण पत्र नहीं होना बताया जा रहा है. पिता नहीं हैं, माता अर्धविक्षिप्त है. अब इसका आधार कार्ड कैसे बने, इसके पीछे शासन के नियम आड़े आ रहे हैं.

यह कहानी है ग्राम फरतखेड़ी के रहने वाले गोलू की, जिसकी मां मानसिक विक्षिप्त है और वह अनाथ की तरह जीवन यापन कर रहा है. जिसके पास न खाने को खाना है और न रहने को कोई घर. जहां जगह मिली, वहां समय बिता लिया. लोगों ने उसका नाम प्यार से गोलू रखा है. गांव के कुछ लोगों ने शासकीय प्राथमिक विद्यालय के प्रधानाध्यापक प्रदीप गामी से मिलकर उसको पिछले साल से ही स्कूल जाने की आदत डाली, जो अब हर रोज समय पर स्कूल जाता है. शिक्षक द्वारा दिया गया होमवर्क भी गांव की गलियों, सडक़ों या किसी घर के बाहर बैठकर पूरा करने लगा है. शिक्षक गामी के अनुसार गोलू अब पढऩा-लिखना सीख गया है, लेकिन गोलू के पास न रहने को छत है, न पहनने को कपड़े. जहां से जो मिल जाता है, उसी से अपना गुजारा कर लेता है. गोलू की पढऩे की लालसा और उसके शांत स्वभाव ने लोगों का मन जीत लिया है. जिसकी मदद को तैयार रहते हैं.

शासन का सहारा मिले, तो संवरे अनाथ का जीवन

ग्रामीणों और शासकीय प्राथमिक विद्यालय के प्रधानाध्यापक गामी की मानें, तो इस बच्चे का दिमाग बहुत अच्छा है. उनका कहना है कि यदि शासन स्तर से इसके दस्तावेज बन जाते हैं, तो शासन की योजनाओं का लाभ मिल जाएगा. साथ ही यदि राजस्व विभाग के अधिकारी इसके नाम से गांव में कहीं भूखंड देते हैं, तो हम जन सहयोग से इसके रहने के लिए आशियाना बना देंगे.

 

दस्तावेजों का अभाव बन रहा बाधा…

 

गोलू का जीवन संवारने के लिए ग्रामीण तो राजी हैं और आगे भी आ रहे हैं, लेकिन दस्तावेजों का अभाव उसके लिए सबसे बड़ी बाधा है. क्योंकि सरकार की योजनाएं तो बहुत हैं, पर किसी भी योजना का लाभ गोलू को नहीं मिल पा रहा है. क्योंकि उसकी माताजी तो अर्ध विक्षिप्त हैं और गोलू के पास आधार कार्ड नहीं है. जिसके बिना गोलू को सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिल पा रहा है और न ही भविष्य में मिलने की उम्मीद है. ऐसे में क्या गोलू बिना आधार कार्ड के भारत का नागरिक कहला पाएगा या नहीं, ये सोचनीय प्रश्न है.

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