भस्म धारण कर भगवान शिव देते हैं वैराग्य, समता और मृत्यु-सत्य है का संदेश – आचार्य पंडित रवि शास्त्री जी महाराज

दमोह। नंदीवन मंदिर परिसर में श्रावण मास के पावन अवसर पर आयोजित शिवलिंग निर्माण एवं महारुद्राभिषेक के द्वितीय दिवस में रुद्राष्टाध्याई के मंत्रों द्वारा वैदिक रीति से विधिवत रुद्राभिषेक कराया गया आचार्य पंडित रवि शास्त्री जी महाराज ने भोलेनाथ भस्म धारण क्यों करते हैं यह बताते हुए कहा कि भगवान शिव का सम्पूर्ण स्वरूप ही संसार को गहन आध्यात्मिक शिक्षा प्रदान करता है उनके मस्तक पर चंद्रमा, जटाओं में गंगाजी, गले में नागराज, हाथ में त्रिशूल और सम्पूर्ण शरीर पर धारण की गई भस्म कोई साधारण श्रृंगार नहीं, बल्कि सनातन धर्म के गूढ़ दर्शन का प्रतीक है विशेष रूप से भगवान शिव का भस्म धारण करना मनुष्य को जीवन की नश्वरता, वैराग्य और आत्मज्ञान का संदेश देता है शिवपुराण, लिंगपुराण, स्कन्दपुराण तथा वैदिक ग्रंथों में भस्म के महत्व का अत्यंत विस्तृत वर्णन मिलता है भगवान शिव स्वयं भस्म से अपने शरीर को अलंकृत करते हैं, इसलिए उन्हें भस्मांगरागी तथा भूतनाथ भी कहा जाता है शिव के लिए भस्म सौंदर्य प्रसाधन नहीं, बल्कि यह उस सत्य का प्रतीक है कि इस संसार में जो कुछ भी दिखाई देता है, उसका अंतिम स्वरूप भस्म ही है शिवपुराण के अनुसार भगवान शिव श्मशान में निवास करते हैं और शरीर पर भस्म धारण करते हैं ताकि समस्त प्राणियों को यह स्मरण रहे कि यह शरीर पंचमहाभूतों से बना है और अंततः पंचतत्वों में ही विलीन होकर भस्म बन जाता है मनुष्य चाहे कितना भी धनवान, बलवान या विद्वान क्यों न हो, मृत्यु के पश्चात उसका शरीर भस्म ही बनता है इसलिए अहंकार, लोभ और मोह का त्याग कर धर्म, सेवा और ईश्वर भक्ति में जीवन लगाना ही बुद्धिमानी है।

आचार्य श्री ने बताया कि भस्म शब्द का अर्थ है जो समस्त पापों और अज्ञान का नाश करे शास्त्रों में कहा गया है कि यज्ञ की पवित्र अग्नि से उत्पन्न भस्म अत्यंत पवित्र मानी गई है वैदिक परंपरा में यज्ञ के उपरांत भस्म धारण करने की परंपरा इसी कारण से चली आ रही है भगवान शिव उस यज्ञीय भस्म को धारण कर यह संदेश देते हैं कि तप, त्याग और यज्ञ से ही जीवन पवित्र बनता है

उन्होंने कहा कि शिवपुराण में वर्णित है कि भस्म धारण करने वाला व्यक्ति यदि श्रद्धा और शास्त्रोक्त विधि से त्रिपुण्ड लगाता है, तो उसे शिवकृपा प्राप्त होती है ललाट पर तीन रेखाओं वाला त्रिपुण्ड केवल एक धार्मिक चिह्न नहीं, बल्कि यह सत्त्व, रज और तम तीनों गुणों पर विजय, अहंकार, कर्म और अज्ञान के नाश, तथा ब्रह्मा, विष्णु और महेश की एकात्मता का प्रतीक माना गया है शिवजी का भस्म धारण करना यह भी सिखाता है कि ईश्वर के समक्ष सभी समान हैं श्मशान में न कोई राजा होता है और न कोई भिखारी वहाँ जाति, पद, धन और प्रतिष्ठा का कोई महत्व नहीं रह जाता अंततः सबका शरीर एक समान भस्म हो जाता है इसलिए सनातन धर्म समता, करुणा और विनम्रता का संदेश देता है उन्होंने बताया कि एक प्रसिद्ध पौराणिक मान्यता के अनुसार भगवान शिव ने कामदेव को अपने तीसरे नेत्र की अग्नि से भस्म कर दिया था इसके पीछे भी यही संदेश है कि अनियंत्रित कामनाएँ मनुष्य को पतन की ओर ले जाती हैं जब काम, क्रोध, लोभ और अहंकार ज्ञानाग्नि में भस्म हो जाते हैं, तभी आत्मा शिवत्व की ओर अग्रसर होती है अतः भगवान शिव के शरीर की भस्म आत्मसंयम और इंद्रिय-निग्रह का भी प्रतीक है

शिवपुराण में यह भी उल्लेख मिलता है कि भगवान शिव अपने भक्तों को बाहरी आडंबर से अधिक अंतःकरण की शुद्धता का महत्व बताते हैं यदि मनुष्य का मन निर्मल नहीं है, तो केवल बाहरी वेशभूषा या धार्मिक प्रदर्शन से भगवान प्रसन्न नहीं होते भस्म यह शिक्षा देती है कि शरीर नश्वर है, परंतु आत्मा अमर है इसलिए मनुष्य को अपने जीवन में सत्य, दया, क्षमा, सेवा और भक्ति को स्थान देना चाहिए आज का समाज भौतिक सुख-सुविधाओं की दौड़ में आध्यात्मिक मूल्यों को भूलता जा रहा है भगवान शिव की भस्म हमें प्रतिदिन यह स्मरण कराती है कि धन, पद और वैभव क्षणभंगुर हैं मृत्यु के बाद कोई भी वस्तु साथ नहीं जाती, केवल हमारे शुभ कर्म ही हमारे साथ चलते हैं इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को धर्म, दान, सत्संग, गौसेवा, वृक्षारोपण, जल संरक्षण और मानव सेवा जैसे पुण्य कार्यों में जीवन का समय लगाना चाहिए भस्म का एक आध्यात्मिक अर्थ यह भी है कि साधक अपने भीतर के विकारों को ज्ञान की अग्नि में जलाकर भस्म कर दे जब मनुष्य का अहंकार भस्म हो जाता है, तभी उसके भीतर शिवत्व का उदय होता है यही कारण है कि अनेक संन्यासी, नागा साधु और शैव परंपरा के साधक भस्म धारण करते हैं यह केवल परंपरा नहीं, बल्कि आत्मसंयम, वैराग्य और ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण का प्रतीक है शिव की उपासना केवल मनोकामना पूर्ति का माध्यम नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और आत्मकल्याण का श्रेष्ठ मार्ग है। भगवान शिव की कृपा से मनुष्य के भीतर विवेक, धैर्य, करुणा और वैराग्य का उदय होता है भगवान भोलेनाथ की भस्म सम्पूर्ण मानवता के लिए एक अमूल्य संदेश है जो जन्मा है उसका अंत निश्चित है, इसलिए अहंकार छोड़कर धर्म, भक्ति और सदाचार का मार्ग अपनाओ जो व्यक्ति इस सत्य को समझकर जीवन जीता है, वही वास्तविक अर्थों में शिवभक्त कहलाने का अधिकारी होता है। भगवान शिव की भस्म हमें मृत्यु का भय नहीं, बल्कि सत्य, वैराग्य और अमर आत्मा के ज्ञान का बोध कराती है।l यही शिवपुराण का संदेश है और यही सनातन धर्म का शाश्वत दर्शन भी है।

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