भोपाल। आचार्य श्री समय सागर ने चातुर्मास और वर्षायोग के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि वर्षाकाल में सूक्ष्म जीवों की रक्षा और अहिंसा धर्म के पालन के लिए श्रमण परंपरा में साधु-संत एक ही स्थान पर चातुर्मास करते हैं। उन्होंने कहा कि चातुर्मास का उद्देश्य केवल बाहरी अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मसाधना, कर्म निर्जरा और आत्मशुद्धि है।
आचार्य श्री ने कहा कि राग, द्वेष और कषाय भाव ही वास्तविक हिंसा के मूल कारण हैं। इन पर संयम रखकर आत्मचिंतन, प्रतिक्रमण, प्रायश्चित और तप के माध्यम से जीवन को निर्मल बनाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि आज के समय में आत्मसंयम और विवेक की आवश्यकता पहले से अधिक है। परिवारों से बच्चों को श्रेष्ठ नैतिक और धार्मिक संस्कार देने का आह्वान करते हुए उन्होंने कहा कि केवल भौतिक सुविधाएं पर्याप्त नहीं हैं। उन्होंने श्रद्धालुओं से चातुर्मास के दौरान धर्म, स्वाध्याय, तप और आत्मसाधना से अधिकाधिक जुड़ने का आग्रह किया।
