
जबलपुर। केन्द्रीय कर्मचारी के द्वारा विवाहित महिला सहकर्मी के द्वारा रेप के आरोप में दर्ज कराई गयी एफआईआर तथा न्यायालय में लंबित प्रकरण को खारिज किये जाने की मांग करते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। हाईकोर्ट जस्टिस प्रमोद कुमार अग्रवाल की एकलपीठ ने सुनवाई के दौरान पाया कि महिला शिक्षित व विवाहित थी। वह याचिकाकर्ता के साथ पिछले चार साल से संबंध में थी। एकलपीठ ने अपने आदेश में कहा है कि बालिग स्वेच्छा से संबंध स्थापित करते है तो वह रेप की श्रेणी में नही आता है।
भोपाल निवासी केंद्रीय कर्मचारी की तरफ से दायर याचिका में कहा गया था कि विवाहित महिला सहकर्मी ने उसके खिलाफ छोला थाने में बलात्कार की एफआईआर दर्ज करवाई है। शिकायतकर्ता को आरोप है कि 10 अक्टूबर 2020 को घर बुलाकर अपीलकर्ता ने जूस में नशीला पदार्थ मिलाकर उसके साथ बलात्कार किया। आरोपी उसे शादी का प्रलोभन देकर विगत चार सालों से बलात्कार कर रहा था।
एकलपीठ ने याचिका की सुनवाई के दौरान पाया कि दोनों के बीच जब रिश्ता शुरू हुआ, तब शिकायतकर्ता पहले से शादीशुदा थी और उसका नौ साल का बच्चा भी था। शिकायतकर्ता ने अपने बयान में माना है कि कथित घटना के समय आरोपी को यह नहीं पता था कि वह शादीशुदा है, जबकि वह खुद जानती थी कि जब तक वह अपने पति से तलाक नहीं ले लेती, तब तक वह आरोपी से शादी नहीं कर सकती।
एकलपीठ ने अपने आदेश में कहा है कि याचिकाकर्ता और शिकायतकर्ता के बीच शादी का सवाल ही नहीं उठता था। शिकायतकर्ता के बयानों और उसके लिखित जवाब से साफ पता चलता है कि उसने अपनी मर्जी से काफी समय तक याचिकाकर्ता के साथ रिश्ता बनाए रखा। याचिकाकर्ता ने कभी उसके साथ दुर्व्यवहार नहीं किया, न ही उसे धमकाया, ब्लैकमेल किया या उसकी तस्वीरें या वीडियो फैलाने की कोशिश की। एकलपीठ ने उक्त आदेश के साथ याचिकाकर्ता के खिलाफ दर्ज एफआईआर तथा न्यायालय में लंबित प्रकरण को निरस्त करने के आदेश जारी किये है।
