ढाका, 27 जुलाई (वार्ता) बंगलादेश में अभियोजन पक्ष ने पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना, दो पत्रकारों और 38 अन्य लोगों के खिलाफ 2013 में हिफाजत-ए-इस्लाम की रैली पर हुई कार्रवाई के मामले में आरोप तय किए हैं। अभियोजन पक्ष का आरोप है कि ढाका के शापला चत्तर में हुई इस कार्रवाई में 58 लोगों की जान गई थी।
बंगलादेश की विशेष अदालत (इंटरनेशनल क्राइम ट्रिब्यूनल) में दाखिल की गई चार्जशीट में ‘एकत्तर टीवी’ की पूर्व पत्रकार फरजाना रूपा और इसी चैनल के मालिक एवं पूर्व मुख्य संपादक मोजम्मेल बाबू का नाम शामिल है। मानवता के खिलाफ अपराध के इस मामले में दोनों पत्रकारों को इसी साल 14 मई को गिरफ्तार किया गया था।
सरकारी वकील अभियोजक अमीनुल इस्लाम ने पत्रकारों को बताया कि फरजाना रूपा ने मोजम्मेल बाबू के कहने पर एकत्तर टीवी के लिए इस घटना पर एक वीडियो रिपोर्ट तैयार की थी। आरोप है कि इस रिपोर्ट में यह गलत दावा किया गया था कि घटना में किसी की मौत नहीं हुई थी।
पत्रकारों के अधिकारों के लिए काम करने वाली संस्थाओं ने इस कदम का विरोध किया है। ‘कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स’ के प्रतिनिधि श्री कुणाल मजूमदार ने कहा कि पत्रकारों पर इतना गंभीर मुकदमा चलाना बिल्कुल गलत है। उन्होंने इन आरोपों को तुरंत वापस लेने की मांग की है। अगर इस मामले में दोष साबित होता है, तो दोनों पत्रकारों को फांसी (मृत्युदंड) की सजा भी हो सकती है, क्योंकि इस विशेष अदालत में कम सजा देने का कोई नियम तय नहीं है।
ये दोनों पत्रकार अगस्त 2024 में हुए विरोध प्रदर्शनों से जुड़े हत्या के मामलों में भी पहले से जेल में बंद हैं। हालांकि उच्च न्यायालय ने उन्हें उन मामलों में जमानत दे दी थी, लेकिन उच्चतम न्यायालय ने उस जमानत पर रोक लगा दी थी। अगर उच्चतम न्यायालय से उन्हें राहत मिल भी जाती है, तो भी इस नए मुकदमे के कारण उन्हें जेल में ही रहना पड़ेगा।
जुलाई-अगस्त 2024 में छात्रों के बड़े आंदोलन के बाद सुश्री शेख हसीना को देश छोड़ना पड़ा था। उनके जाने के बाद बनी मुहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार ने सुश्री हसीना पर 150 से ज्यादा मुकदमे दर्ज किए हैं। इनमें से एक मामले में इसी विशेष अदालत ने सुश्री हसीना को उनकी गैरमौजूदगी में ही मौत की सजा सुना दी थी। सुश्री हसीना ने इन सभी मामलों को राजनीति से प्रेरित बताया है और अदालत की कार्रवाई को एक दिखावा करार दिया है।
सुश्री हसीना और इन पत्रकारों के खिलाफ हो रही इस कार्रवाई को उनके शासनकाल के फैसलों की जांच के तौर पर देखा जा रहा है। हालांकि, पत्रकारों पर इस तरह के गंभीर मुकदमे दर्ज होने से यह चिंता भी बढ़ गई है कि नई सरकार भी न्याय व्यवस्था का इस्तेमाल विरोधियों को दबाने के लिए कर रही है।
