
दमोह। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी व शिक्षाविद स्व. ज्ञान चंद्र श्रीवास्तव की जन्म शताव्दी वर्ष की समारोह पूर्वक शुरूवात की गई। स्थानीय शास. पी.जी. कॉलेज दमोह में आयोजित भव्य व गरिमामय समारोह में ज्ञानसाहब की जीवनी पर केन्द्रित पुस्तक परिवर्तनकांक्षी (व्यष्टि से समष्टि की जीवन गाथा) का विमोचन किया गया। समारोह के मुख्य अतिथि डा. विनोद मिश्रा, कुल गुरू रानी अबंतीवाई लोधी विश्वविद्यालय सागर व कार्यक्रम अध्यक्ष सत्यमोहन वर्मा वरिष्ठ सहित्यकार दमोह थे। कार्यक्रम का प्रारंभ मां सरस्वती के पूजन व ज्ञान साहब के चित्र पर माल्यार्पण व दीप प्रज्ज्वलन के द्वारा किया गया। श्रीमती प्राची वर्मा (पुणे) ने सितार की ध्वनि के साथ सुंदर सरस्वती वंदना प्रस्तुत की। ट्रस्ट की ओर से न्यास अध्यक्ष डॉ. केदार शिवहरे, नीरज हर्ष श्रीवास्तव, श्जलज हर्ष श्रीवास्तव, श्रीमती भावना श्रीवास्तव, अजय टंडन, डॉ, आलोक जैन, शरद मेहता आदि ने मंचाशीन अतिथियो का शाल श्रीफल व पुष्पाहारो से स्वागत किया।लेखक का आत्म निवेदन श्रीमती नीलिमा वर्मा व पंकज हर्ष श्रीवास्तव ने प्रस्तुत किया और कहा की ज्ञान साहब समाज के प्रेरक स्तंभ थे।संपादक का कथन प्रस्तुत करते हुये सुश्री प्राची तिवारी छवि (भोपाल) ने भावुक संस्मरण सुनाये और कहा कि पुस्तक लिखते समय मैने ज्ञान साहब को और अपने पिता को याद किया।इसके उपरांत मुख्य अतिथि कुल गुरू डॉ विनोद मिश्रा ने पुस्तक परिवर्तनकांक्षी का विमोचन किया। डॉ मिश्रा ने अपने बोद्धिक उद्बोधन से उपस्थित श्रोताओं को रोमांचित किया और कहा राष्ट्र धर्म प्रथम स्थान पर है। उन्होंने उपस्थित नागरिकों से पंच परिवर्तन मे योगदान करने का आवाहन किया।कार्यक्रम अध्यक्ष सत्यमोहन वर्मा वरिष्ट कवि ने कहा कि ज्ञान साहब, बहू आयामी व्यक्तित्व के धनी थे। वे महाविद्यालय के संस्थापक प्राचार्य थे। उनका सुर्दशन व्यक्तित्व देखने लायक था। वे सच्चे अर्थो में त्याग की प्रतिमूर्ति थे। मेरे पास उनके जीवन की सैकड़ो स्मृतियां है। जो कभी भूलाई नहीं जा सकती। इस पुस्तक के माध्यम से ज्ञान साहब के चरित्र को स्थाई स्वरूप प्रदान किया गया है जो स्वागत योग्य है। समारोह को सफल संचालन राष्ट्रपति पुरूस्कार प्राप्त प्राचार्य डां. आलोक सोनवलकर ने किया। ट्रस्ट की ओर से डां. केदार शिवहरे ने आभार प्रदर्शन किया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में शहर के प्रतिष्ठित नागरिकगण व महिलाओं की उपस्थिति रही कार्यक्रम का समापन राष्ट्रगीत जन-गण-मन से किया गया।
