
जबलपुर। मप्र हाईकोर्ट ने एक बार फिर स्पष्ट किया कि न्याय केवल अधिकार का नहीं, बल्कि समय पर अधिकार के प्रयोग का भी पक्षधर है। यदि कोई कर्मचारी वर्षों तक अपने अधिकार के लिए मौन रहता है और बाद में दूसरे कर्मचारियों को मिली राहत देखकर अदालत पहुंचता है, तो उसे समान लाभ नहीं मिल सकता। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने ऐसे दावेदार को फेंस सिटर मानते हुए उसकी याचिका खारिज कर दी।
जस्टिस विशाल धागत की एकलपीठ ने संभव मनु अयाची की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता वर्ष 2016 से वरिष्ठता का लाभ चाहता है, लेकिन उसने लगभग एक दशक तक अपने अधिकार के लिए कोई प्रभावी कानूनी कदम नहीं उठाया। केवल वर्ष 2023 में दिया गया अभ्यावेदन भी नया कारण-ए-दावा नहीं बन सकता। पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि समान परिस्थितियों वाले कर्मचारियों को समान लाभ देने का सिद्धांत लागू होता है, लेकिन यह उन लोगों पर लागू नहीं होगा जो लंबे समय तक निष्क्रिय बने रहें और दूसरों की सफलता के बाद राहत मांगने पहुंचें। देरी और लाचेज ऐसे मामलों में राहत देने में सबसे बड़ी बाधा हैं।
