वैशाली एस नई दिल्ली: भारतीय शिल्पकला की पहचान उसकी मौलिकता में है। इसे बदलने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि आवश्यकता इस बात की है कि इसकी प्रस्तुति ऐसी भाषा में हो जिसे पूरी दुनिया समझ और अपनाए।
मेरे लिए किसी परिधान की आत्मा और उसकी अभिव्यक्ति दो अलग-अलग बातें हैं। आत्मा कभी नहीं बदलनी चाहिए, जबकि उसकी अभिव्यक्ति समय के साथ विकसित होती रहनी चाहिए।
भारतीय हस्तकरघा, पारंपरिक बुनाई तकनीकें, प्राकृतिक रेशे, सदियों से संचित ज्ञान, कारीगरों का कौशल और हर शिल्प के पीछे की दर्शन-परंपरा हमारी असली ताकत हैं। यही भारत की सबसे बड़ी वैश्विक पहचान और प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त है। यदि हम इन मूल्यों से समझौता करेंगे तो अपनी विशिष्टता खो देंगे।
बदलाव केवल इस बात में होना चाहिए कि हम अपनी विरासत को आज के वैश्विक उपभोक्ता के सामने किस रूप में प्रस्तुत करते हैं। आधुनिक डिज़ाइन, उपयोगिता, स्टाइलिंग, संचार और प्रभावी कहानी कहने की कला भारतीय शिल्प को वैश्विक बाज़ार से जोड़ सकती है, बिना उसकी मूल पहचान बदले।
पेरिस, टोक्यो, न्यूयॉर्क या मिलान का उपभोक्ता किसी सांस्कृतिक वस्तु को नहीं, बल्कि ऐसा परिधान खरीदना चाहता है जो उसकी आधुनिक जीवनशैली को व्यक्त करे। इसलिए हमारा उद्देश्य शिल्प को आधुनिक बनाना नहीं, बल्कि उसके बारे में संवाद को आधुनिक बनाना होना चाहिए।
वैशाली एस कूत्योर की यही कार्य-दृष्टि रही है। हमने अपने बुनकरों से कभी पारंपरिक तकनीक छोड़ने के लिए नहीं कहा। इसके बजाय हमने उन्हीं तकनीकों में नई संभावनाएँ तलाशीं। प्रत्येक संग्रह की शुरुआत करघे से होती है और नवाचार परंपरा के भीतर ही विकसित किया जाता है। इससे कारीगर केवल आपूर्तिकर्ता नहीं, बल्कि सृजन के साझेदार बनते हैं और उन्हें उनके कार्य का उचित मूल्य भी मिलता है।
इटली और फ्रांस जैसे देशों ने भी अपने कारीगरों को सशक्त बनाकर और उनकी कला को आधुनिक वैश्विक भाषा में प्रस्तुत करके सफलता प्राप्त की। भारत भी अपनी परंपरा को सुरक्षित रखते हुए यही परिवर्तन ला सकता है।
हस्तकरघा केवल संरक्षण का विषय नहीं, बल्कि नवाचार का माध्यम भी होना चाहिए। विरासत तभी जीवित रहती है जब हर पीढ़ी उसमें अपना योगदान देती है।
पेरिस हाउट कूत्योर वीक में जब हमारे संग्रह प्रस्तुत होते हैं तो अंतरराष्ट्रीय दर्शक सबसे पहले उनकी विशिष्टता से प्रभावित होते हैं। बाद में जब उन्हें पता चलता है कि हर धागा भारत में हाथ से बुना गया है, तब भारतीय हस्तकरघा की छवि पारंपरिक नहीं बल्कि आधुनिक, नवोन्मेषी और लक्ज़री उत्पाद के रूप में स्थापित होती है।
14 से 17 जुलाई 2026 तक नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित भारत टेक्स 2026 ने इसी सोच को और मजबूत किया। 100 से अधिक ज्ञान सत्रों वाले इस आयोजन में नीति-निर्माताओं, वैश्विक ब्रांडों, उद्योग जगत, डिज़ाइनरों और नवाचार विशेषज्ञों ने भाग लिया।
मुझे Indian Brands, Global Ambitions: Redefining Retail Growth Beyond Borders सत्र में शामिल होने का अवसर मिला। केंद्रीय वस्त्र मंत्री ने भारतीय वस्त्र उद्योग की सबसे बड़ी ताकत हमारे कारीगरों के कौशल को बताया और गुणवत्ता सुधार के साथ प्रामाणिकता बनाए रखने पर बल दिया।
ये विचार वैशाली एस कूत्योर की कार्य-दृष्टि से पूरी तरह मेल खाते हैं। हमारा उद्देश्य कारीगरों को उचित मूल्य और सम्मान दिलाना, ट्रेसबिलिटी एवं पारदर्शिता बढ़ाना, पारंपरिक टिकाऊ वस्त्र संस्कृति को मजबूत करना तथा ब्लॉकचेन आधारित ट्रेसबिलिटी के माध्यम से भारतीय शिल्प पर वैश्विक विश्वास को और सुदृढ़ करना है।
मेरा मानना है कि भारत का भविष्य केवल बड़े ब्रांडों में नहीं, बल्कि उन उभरते डिज़ाइनरों को प्रोत्साहित करने में है जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय शिल्प की नई पहचान बना रहे हैं। उनकी सफलता से पूरे वस्त्र उद्योग और बुनकर समुदाय को व्यापक सामाजिक एवं आर्थिक लाभ मिलेगा।
भारत टेक्स आज एक ऐसा मंच बन चुका है जो नीति-निर्माताओं, उद्योग, डिज़ाइनरों, निर्माताओं, खरीदारों और नवाचारकर्ताओं को एक साथ लाकर भारतीय वस्त्र उद्योग का भविष्य तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
आईटीपीओ के अध्यक्ष जावेद अशरफ (आईएफएस) ने भी भारतीय वस्त्रों को वैश्विक मंच पर प्रभावी प्रस्तुति, बेहतर क्यूरेशन और अंतरराष्ट्रीय मानकों के साथ प्रदर्शित करने की आवश्यकता पर बल दिया। वहीं वस्त्र मंत्रालय द्वारा एमएसएमई, कारीगरों और डिज़ाइनरों के लिए शुरू की गई विभिन्न योजनाएँ भी उत्साहवर्धक हैं।
भारत टेक्स 2026 ने मेरे इस विश्वास को और मजबूत किया है कि भारत की वस्त्र विरासत की कहानी अभी सही मायनों में दुनिया के सामने प्रस्तुत होना शुरू हुई है। यदि डिज़ाइनर, कारीगर और नीति-निर्माता इसी दिशा में साथ मिलकर आगे बढ़ते रहे, तो भारतीय शिल्प केवल संरक्षित ही नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक लक्ज़री जगत में उत्कृष्टता का नया मानक भी बनेगा।
