एमपी टॉपर आर्यमन सोलंकी बोले— संतुलित दिनचर्या और माता-पिता का मार्गदर्शन ही मेरी सफलता का राज

जबलपुर। नीट यूजी-2026 में ऑल इंडिया रैंक (AIR) 46 हासिल कर मध्यप्रदेश में टॉप करने वाले संस्कारधानी के होनहार छात्र आर्यमन सोलंकी ने अपनी सफलता का श्रेय अपने माता-पिता को दिया है। नवभारत से विशेष बातचीत में आर्यमन ने अपनी पढ़ाई की रणनीति, दिनचर्या, सोशल मीडिया के उपयोग और भविष्य के सपनों को लेकर खुलकर बात की। उन्होंने कहा कि यह उपलब्धि केवल उनकी नहीं, बल्कि उनके माता-पिता, शिक्षकों और आकाश इंस्टीट्यूट के मार्गदर्शन का परिणाम है। आर्यमन के पिता डॉ. फरेंद्र सोलंकी शहर के वरिष्ठ यूरोलॉजिस्ट हैं, जबकि उनकी माता डॉ. अनुपमा सोलंकी प्रसिद्ध गायनेकोलॉजिस्ट हैं। उन्होंने कहा कि बचपन से ही घर का माहौल पढ़ाई, अनुशासन और मरीजों की सेवा से जुड़ा रहा, जिसने उन्हें हमेशा बेहतर करने की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा, “मम्मी-पापा ने कभी पढ़ाई का दबाव नहीं बनाया, बल्कि सही दिशा दिखाई और हर परिस्थिति में मेरा मनोबल बढ़ाया।

*आप दिनभर में कितने घंटे पढ़ाई करते थे?*

जब उनसे पढ़ाई के घंटों और सफलता के फॉर्मूले के बारे में पूछा गया तो आर्यमन ने बताया कि उन्होंने कभी केवल घंटों की संख्या पर भरोसा नहीं किया, बल्कि गुणवत्ता के साथ पढ़ाई की। वह प्रतिदिन चार घंटे आकाश इंस्टीट्यूट में पढ़ाई करते थे और लगभग चार घंटे घर पर स्व-अध्ययन करते थे। उन्होंने कहा कि लगातार पढ़ाई करने के बजाय बीच-बीच में ब्रेक लेना और खुद को मानसिक रूप से तरोताजा रखना भी बेहद जरूरी है। उन्होंने यह भी बताया कि वह सोशल मीडिया से पूरी तरह दूर नहीं रहे। जरूरत के अनुसार सोशल मीडिया का उपयोग करते थे, दोस्तों से जुड़े रहते थे और खेलकूद व अन्य गतिविधियों का भी आनंद लेते थे। उनका मानना है कि यदि समय का सही प्रबंधन किया जाए तो पढ़ाई के साथ मनोरंजन भी संभव है। उन्होंने कहा, “मैंने कभी खुद को केवल किताबों तक सीमित नहीं रखा। पढ़ाई के साथ जिंदगी को भी एंजॉय किया, जिससे तनाव कम रहा और पढ़ाई में बेहतर फोकस बना रहा।”

*जबलपुर की मेडिकल व्यवस्था को विकसित करूँगा*

भविष्य की योजनाओं पर बात करते हुए आर्यमन ने कहा कि उनका सपना अपने पिता की तरह यूरोलॉजिस्ट बनना है। उनका लक्ष्य केवल एक सफल डॉक्टर बनना नहीं, बल्कि जबलपुर की चिकित्सा व्यवस्था को और अधिक आधुनिक एवं सशक्त बनाना है। उन्होंने कहा कि आज भी कई गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए लोगों को नागपुर और अन्य बड़े शहरों का रुख करना पड़ता है। वह चाहते हैं कि भविष्य में जबलपुर में ही अत्याधुनिक चिकित्सा सुविधाएं विकसित हों, ताकि मरीजों को बेहतर इलाज के लिए शहर से बाहर न जाना पड़े। उन्होंने कहा, “मैं चाहता हूं कि जबलपुर मेडिकल सुविधाओं के मामले में देश के अग्रणी शहरों में शामिल हो और यहां के लोगों को हर तरह का आधुनिक इलाज अपने ही शहर में उपलब्ध हो।” आर्यमन की यह सोच न केवल उनकी सफलता को विशेष बनाती है, बल्कि समाज के प्रति उनकी जिम्मेदारी और सेवा भाव को भी दर्शाती है। उनकी उपलब्धि ने पूरे मध्यप्रदेश, विशेषकर संस्कारधानी जबलपुर को गौरवान्वित किया है और वे हजारों मेडिकल अभ्यर्थियों के लिए प्रेरणा बनकर उभरे हैं।

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