नई दिल्ली, 17 जुलाई (वार्ता) रिलायंस उद्योग समूह की कंपनी रिलायंस जियो के करीब 1,600 संचार उपग्रहों का नेटवर्क विकसित करने प्रस्ताव को अंतरिक्ष नियामक इन-स्पेस (भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष संवर्धन एवं प्राधिकार केंद्र) ने तकनीकी रूप से उपयुक्त माना है। यह जानकारी शुक्रवार को यहां सूत्रों ने दी। इससे भारत के पहले स्वदेशी लो अर्थ ऑर्बिट (लीयो) सैटेलाइट नेटवर्क की राह अब और साफ होती दिख रही है और जियो के इस प्रस्ताव को तकनीकी मंजूरी मिलना उसकी उपग्रह इंटरनेट सेवा की महत्वाकांक्षी योजना के लिए एक अहम पड़ाव माना जा रहा है।
सूत्रों के मुताबिक इस प्रस्ताव का तकनीकी मूल्यांकन इन-स्पेस, इसरा और दूरसंचार विभाग (डीओटी) के वायरलेस विनियोजन एवं समन्वय प्रभाग (डब्ल्यूपीसी) ने संयुक्त रूप से किया। समीक्षा में जियो के प्रस्तावित नेटवर्क को तकनीकी क्षमता के मामले में स्टारलिंक जैसी वैश्विक संचार उपग्रहण प्रणालियों के समकक्ष माना गया है। सत्रों ने कहा कि जियो को इस परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए अभी कई और नियामकीय प्रक्रियाओं को पार करना होगा।
इस परियोजना के पूरे होने पर यह देश का निजी क्षेत्र में विकसित पहला विशाल स्वदेशी लीयो संचार उपग्रह तंत्र होगा। जियो ने इसके लिए सरकार से इंटरनेशनल टेलीकम्युनिकेशन यूनियन (आईटीयू) में जरूरी सूचना , अंतरिक्ष उपग्रह परिभ्रमण कक्षा के लिए अधिकार और कक्षीय स्थान हासिल करने में सहयोग मांगा है। जियो इस नेटवर्क के जरिए सैटेलाइट ब्रॉडबैंड, सेल्युलर बैकहॉल और मोबाइल सैटेलाइट सेवाएं उपलब्ध कराने की योजना पर काम कर रही है।
कंपनी की योजना भविष्य में डायरेक्ट-टू-डिवाइस सेवा शुरू करने की भी है, जिसके जरिए मोबाइल फोन सीधे सैटेलाइट से कनेक्ट हो सकेंगे। इसके लिए 20 से 22 ग्राउंड स्टेशन स्थापित करने की भी योजना है। रिपोर्ट के मुताबिक जियो का प्रस्तावित नेटवर्क भारत में 4.5 से 5 टेराबिट प्रति सेकंड (टीबीपीएस) क्षमता उपलब्ध कराने के लिए डिजाइन किया गया है। तुलना के लिए, भारत में स्टारलिंक को 600 गीगाबिट प्रति सेकंड (जीबीपीएस) क्षमता की मंजूरी मिली है, जबकि अमेजन की लीयो उपग्रह परियोजना लगभग 3 टीबीपीएस क्षमता की योजना पर काम कर रही है, लेकिन उसे अभी इन-स्पेस की मंजूरी मिलनी बाकी है।

