हैदराबाद, भारत में एक नई आर्थिक अवधारणा ‘पर्पल इकोनॉमी’ ने दस्तक दी है, जो देश की अर्थव्यवस्था में बड़ा बदलाव लाने की क्षमता रखती है। डेलॉयट इंडिया और एनेबल इंडिया की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, यदि भारत के लगभग 10 करोड़ दिव्यांगजनों को उचित अवसर और संसाधन प्रदान किए जाएं, तो देश में $150 बिलियन का एक विशाल नया बाजार तैयार हो सकता है। यह रिपोर्ट सहानुभूति से आगे बढ़कर दिव्यांगों को देश के आर्थिक विकास में ‘सक्रिय भागीदार’ और ‘योगदानकर्ता’ के रूप में स्थापित करने की वकालत करती है।
रोजगार और उत्पादकता में बड़ा अंतर
वर्तमान में भारत की सामान्य आबादी के मुकाबले दिव्यांग कार्यबल की भागीदारी मात्र 25% से भी कम है, जबकि सामान्य आबादी में यह आंकड़ा 60% है। रिपोर्ट में यह स्पष्ट किया गया है कि यदि दिव्यांगों के अनुकूल डिजिटल प्लेटफॉर्म, सुलभ बुनियादी ढांचे और कौशल विकास को प्राथमिकता दी जाए, तो इस अंतर को पाटकर देश की उत्पादकता को कई गुना बढ़ाया जा सकता है। यदि पूर्ण समावेशन (Full Inclusion) को लागू किया जाता है, तो यह आर्थिक क्षमता $150 बिलियन से बढ़कर $500 बिलियन तक भी पहुँच सकती है।
सशक्तिकरण के लिए अनिवार्य कदम
पर्पल इकोनॉमी को हकीकत में बदलने के लिए सरकार और कॉर्पोरेट जगत को मिलकर काम करना होगा। इसके लिए एआई-आधारित सुलभ तकनीकों को सस्ता बनाना, सार्वजनिक स्थानों पर अनिवार्य रैंप-लिफ्ट सुविधाएँ और आधुनिक डिजिटल क्षेत्रों में युवाओं का कौशल विकास करना आवश्यक है। एनएबल इंडिया जैसे संगठनों द्वारा शुरू की गई पहलें, जैसे ‘प्रेरणया’ कार्यक्रम, दिव्यांग महिलाओं के रोजगार के अवसर बढ़ा रही हैं। यह पहल न केवल दिव्यांगों को आत्मनिर्भर बनाएगी, बल्कि राष्ट्र की टैक्स राजस्व और औद्योगिक वृद्धि में भी महत्वपूर्ण योगदान देगी।

