ग्वालियर चंबल डायरी
हरीश दुबे
निवर्तमान विधायक राजेन्द्र भारती के परिवार द्वारा उपचुनाव में टिकट की स्पर्धा में अपनी दावेदारी पीछे खींच लेने के बाद कांग्रेस में अवधेश नायक ही टिकट के मजबूत दावेदार के रुप में उभरे थे, वजह यह कि टिकट के दूसरे प्रमुख दावेदार माने जा रहे घनश्याम सिंह ने अपनी पारंपरिक सीट सेंवढ़ा छोड़कर दतिया लौटने के प्रति अनिच्छा जताई थी। इसके बाद अवधेश नायक टिकट के प्रति इतने आश्वस्त हो गए कि उन्होंने नामांकन पत्र भी खरीद लिया था लेकिन पार्टी ने भरोसा किया राजपरिवार से जुड़े घनश्याम सिंह पर। अवधेश नायक कोपभवन में चले गए हैं। दतिया विधानसभा क्षेत्र में लगभग 33,000 ब्राह्मण मतदाता हैं, जिन पर नायक का सीधा प्रभाव माना जाता है, लिहाजा अपने प्रमुख ब्राह्मण नेता के नाराज होने के बाद कांग्रेस के चुनाव प्रबंधकों की चिंताएं बढ़ गई हैं।
उन्हें मनाने के लिए कांग्रेस के बड़े नेता रोजाना उनके घर पर दस्तक दे रहे हैं लेकिन भाजपा में वापस लौटने की अटकलों के बीच अवधेश ने असमंजस की स्थिति बनाए रखते हुए अभी तक पत्ते नहीं खोले हैं। हाल ही में कांग्रेस से उनकी कुछ नाराजगी की खबरों के बीच, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता उन्हें मनाने में जुटे हैं। जीतू पटवारी उनके घर जाकर खाना खा आए हैं तो दिग्विजय ने पिछली बार उनका टिकट कटने में अपनी भूमिका कबूल करते हुए भरी सभा में उनसे माफी मांगी है। गौरतलब है कि डॉ. नरोत्तम मिश्रा से मतभेदों के चलते उन्होंने 23 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले कमलनाथ के कहने पर भाजपा का साथ छोड़कर कांग्रेस का दामन थाम लिया था।
कांग्रेस ने शुरुआती सूची में उन्हें दतिया से उम्मीदवार घोषित भी किया लेकिन बाद में स्थानीय विरोध के चलते उनका टिकट बदलकर राजेंद्र भारती को दे दिया गया था, तब उन्हें अगले चुनाव का भरोसा दिया गया था, यह भरोसा पूरा नहीं हुआ और अब उनके भाजपा में लौटने की अटकलें लग रही हैं। दरअसल, अवधेश नायक दतिया में कद्दावर राजनीतिज्ञ और प्रमुख ब्राह्मण चेहरा की तो छवि रखते ही हैं। पार्षद का चुनाव जीतकर अपना राजनीतिक सफ़र शुरू करने वाले नायक की छवि कांग्रेस में शामिल होने के पहले तक कट्टर संघनिष्ठ की रही है। दतिया क्षेत्र के स्थानीय राजनीतिक और चुनावी समीकरणों में उनका करीब पिछले दो दशकों से गहरा प्रभाव माना जाता रहा है।
वे सियासत के समर में रिस्क मोल लेते रहे हैं, मसलन 2008 के आसपास जब उमा भारती ने भाजपा से अलग होकर ‘भारतीय जन शक्ति पार्टी’ बनाई, तब नायक भी उनके साथ चले गए और दतिया से चुनाव लड़ा था। बाद में वह फिर से भाजपा में लौट आए। शिवराज ने उन्हें पाठ्यपुस्तक निगम का उपाध्यक्ष बनाकर राज्यमंत्री का दर्जा दिया लेकिन वे उनका साथ छोड़कर कांग्रेस में चले आए। अब लगता है कि वे फिर से सरप्राइज देने के मूड में हैं। वे कांग्रेस से टूटते हैं तो पार्टी के चुनाव प्रबंधन के लिए बड़ा झटका होगा। कांग्रेस ने कई कनिष्ठ नेताओं को तो इस बार स्टार प्रचारक बनाया है लेकिन नायक को नहीं, प्रतीत होता है कि कांग्रेस भी उनके बगैर उपचुनाव लड़ने के लिए खुद को ढालने में जुट गई है।
अब जातिगत समीकरणों पर केंद्रित हुआ चेंबर चुनाव
चेंबर चुनाव में इस बार जीत – हार की संभावनाओं का आंकलन अभी तलक राजनीतिक समीकरणों के आधार पर ही किया जा रहा था लेकिन अब जातिगत समीकरण उभार पर हैं। चेंबर की मतदाता सूची में अग्रवाल समाज का एकाधिकारिक वर्चस्व है, लिहाजा तमाम प्रत्याशियों ने अपनी राह आसान करने के लिए अब खुलकर अग्रवालवाद का परचम लहरा दिया है। इससे सर्वाधिक असुविधा जैन, सिंधी एवं अन्य समुदायों से ताल्लुक रखने वाले प्रत्याशियों को हुई है। चेंबर चुनाव कार्यालय ने मतपत्र पर प्रत्याशियों के उपनाम न छापे जाने की गाइडलाइन बनाई थी, इसका तीखा विरोध हुआ। ताजा हालात यह हैं कि ग्वालियर चंबल अंचल के व्यापारियों एवं उद्यमियों के इस सबसे बड़े संगठन के इंतखाब में व्यापारियों की समस्याएं, मांगें और कारोबार की तरक्की से जुड़े मसले गौण हो गए हैं और इनकी जगह ‘अग्रवालवाद’ (जातिगत समीकरण) और राजनीतिक गुटबाजी सबसे बड़े चुनावी मुद्दे बनकर उभरे हैं. चुनाव में व्यापारियों के मूल मुद्दों से ज्यादा जातीय एकजुटता और राजनीतिक दिग्गजों का वर्चस्व चर्चा का केंद्र बना हुआ है.
कुल मतदाताओं में अग्रवाल समाज का एक बड़ा निर्णायक हिस्सा है. निवर्तमान अध्यक्ष डॉ. प्रवीण अग्रवाल इस बार व्हाइट हाउस से अलग होकर निर्दलीय रूप में अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ रहे हैं. वे अपने समाज और समर्थकों के दम पर चुनाव को अपने हक में बदलने की कोशिश में हैं। सिर्फ अध्यक्ष ही नहीं, बल्कि उपाध्यक्ष, सचिव पद पर भी बड़े अग्रवाल चेहरे चुनावी मैदान में डटे हैं. मुद्दों के बजाए अब इसी बात पर बहस होती है कि चेंबर के चुनाव में किस समाज का कितना प्रभाव रहेगा. चुनावों में व्यापारिक प्राथमिकताओं से कहीं अधिक अग्रवाल समाज की लामबंदी, पैनल की साख और राजनीतिक आकाओं का प्रभाव जीत-हार का मुख्य पैमाना साबित होने वाला है.
ग्वालियर आ रहे हैं कॉकरोच पार्टी के मुखिया !
तो क्या कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक व अध्यक्ष अभिजीत दीपके ग्वालियर आकर पुलिस और प्रशासन को चुनौती देने वाले हैं। दरअसल, दीपके ने सोशल मीडिया पर वीडियो जारी कर चेतावनी दी है कि यदि छात्रों को परेशान किया गया, तो वे अपनी पूरी टीम के साथ ग्वालियर आकर बड़ा आंदोलन करेंगे। ग्वालियर पुलिस ने महाराज बाड़ा पर बिना अनुमति धरना-प्रदर्शन करने के आरोप में कॉकरोच जनता पार्टी के 15 कार्यकर्ताओं के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है। मध्य प्रदेश में इस संगठन या पार्टी के खिलाफ दर्ज की गई यह पहली कानूनी कार्रवाई है। इसी के बाद असंतोष भड़का हुआ है।
