नयी दिल्ली, 13 जुलाई (वार्ता) पश्चिम एशिया संकट और मानसून की चिंताओं के बीच देश में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) पर आधारित महंगाई दर जून 2026 में बढ़कर 4.38 प्रतिशत हो गयी।
विश्लेषकों के अनुसार, नयी सीरीज होने के बाद 16 महीने में मुद्रास्फीति का यह उच्चतम स्तर है। इससे रिजर्व बैंक पर नीतिगत ब्याज दर बढ़ाने का दबाव बन सकता है। सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय द्वारा सोमवार को जारी एक विज्ञप्ति में बताया गया है कि मई में खुदरा मुद्रास्फीति 3.93 प्रतिशत (संशोधित आंकड़ा) थी। जून माह में बढ़ोतरी मुख्य रूप से खाद्य वस्तुओं, परिवहन सेवाओं और ईंधन की कीमतों में वृद्धि के कारण हुई।
जून में खाद्य मुद्रास्फीति बढ़कर 5.32 प्रतिशत हो गयी, जबकि मई में यह 4.78 प्रतिशत थी। ग्रामीण क्षेत्रों में महंगाई का दबाव शहरी क्षेत्रों की तुलना में अधिक बना रहा। जून में ग्रामीण खुदरा महंगाई 4.74 प्रतिशत दर्ज की गई, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह 3.92 प्रतिशत रही। ग्रामीण क्षेत्रों में खाद्य महंगाई 5.45 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों में 5.09 प्रतिशत रही। जून में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक 107.00 रहा जो एक माह पूर्व 105.91 था।
जून 2026 में चांदी के आभूषणों के खुदरा मूल्य 133.21 प्रतिशत ऊंचे रहे लेकिन मई (155.25 प्रतिशत) की तुलना में इसमें नरमी रही है। माह के दौरान अदरक का खुदरा भाव (54.41 प्रतिशत) , सोना, हीरा और प्लैटिनम के आभूषणों का भाव (36.82 प्रतिशत), टमाटर का 31.92 प्रतिशत और किशमिश तथा मुनक्का का 20.52 प्रतिशत ऊंचा था। इसके विपरीत आलोच्य माह में आलू के खुदरा भाव पिछले साल से 20.34 प्रतिशत नीचे रहे जबकि मटर 9.67 प्रतिशत नीचे आ गयी। मोटर कार और जीप, जीरा, तथा मोटरसाइकिल और स्कूटर की कीमतें भी पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में कम रहीं।
पीएचडी चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज के अध्यक्ष राजीव जुनेजा ने कहा, “हालांकि, समग्र खुदरा महंगाई अभी भी भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) द्वारा निर्धारित सीमा के भीतर बनी हुई है, लेकिन खाद्य महंगाई पर लगातार बना दबाव नीति-निर्माताओं के लिए चिंता का विषय है, और इस पर निरंतर ध्यान देने की आवश्यकता है।”
पीएचडी चैंबर के महासचिव एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी डॉ. रंजीत मेहता ने कहा, “ग्रामीण और शहरी महंगाई के बीच बढ़ता अंतर इस बात की ओर संकेत करता है कि आपूर्ति व्यवस्था (सप्लाई साइड) को अधिक कुशल बनाने और कृषि उत्पादकता बढ़ाने के प्रयास लगातार जारी रखने की आवश्यकता है। आने वाले समय में अनुकूल मानसून और प्रभावी वितरण प्रणाली खाद्य महंगाई के दबाव को कम करने के साथ-साथ उपभोग और निवेश को समर्थन देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।”
क्रिसिल की वरिष्ठ निदेशक एवं मुख्य अर्थशास्त्री दीप्ति देशपांडे ने जून के सीपीआई आंकड़ों पर कहा, “ईंधन की कीमतों से बढ़ी महंगाई, खाद्य महंगाई का जोखिम भी बरकरार है।” उन्होंने कहा कि खुदरा महंगाई जनवरी 2025 के बाद पहली बार इस ऊंचे स्तर पर पहुंची है। जून में कुल खुदरा महंगाई में खाद्य महंगाई का योगदान लगभग 1.85 प्रतिशत जबकि गैर-खाद्य महंगाई का योगदान लगभग 2.50 प्रतिशत अंक दर्ज किया गया।
सुश्री देशपांडे की राय में “यह भी ध्यान देने योग्य है कि (सितंबर 2025 में) जीएसटी दरों के युक्तिसंगत किये जाने से महंगाई पर पड़ने वाला राहतकारी प्रभाव मौजूदा तिमाही के अंत तक ही रहने की संभावना है।” इन परिस्थितियों को देखते हुए क्रिसिल का अनुमान है कि आने वाले महीनों में खुदरा महंगाई में और तेजी आ सकती है। वित्त वर्ष 2026-27 में औसत खुदरा महंगाई 5.1 प्रतिशत रहेगी जबकि पिछले वित्त वर्ष में यह 2.0 प्रतिशत थी।
महंगाई के आंकड़ों पर प्रतिक्रिया देते हुए 360 वन ऐसेट के मुख्य अर्थशास्त्री विक्रम छाबड़ा ने कहा, “जून 2026 की मुद्रास्फीति बाजार की उम्मीदों से ऊंची रही है पर मुद्रास्फीति का परिदृश्य पिछले महीने की तुलना में अधिक हल्का हो गया है। ऐसा कच्चे तेल की कीमतों में प्रत्याशा से अधिक तेज गति से गिरावट और जुलाई की वर्षा से जून में रही कमी की तेजी से भरपाई होने के कारण है।”
उन्होंने कहा कि मुद्रास्फीति पर पश्चिम एशिया संकट और कमजोर मानसून का खतरा अब भी मंडरा रहा है, इस समय के उनके सामान्य अनुमानों के अनुसार खुदरा मुद्रास्फीति 2026-27 में औसतन पांच प्रतिशत के आसपास रहेगी। इससे रिजर्व बैंक अभी अगस्त तक नीतिगत दर की वृद्धि पर ब्रेक बनाये रखेगा और तब तक आर्थिक वृद्धि तथा मुद्रास्फीति के बीच के उभरते समीकरणों पर ध्यान देकर आगे कोई कदम उठायेगा।

