डॉ. ब्रहादीप अलूने (अंतर्राष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ) बांग्लादेश एक बार फिर निर्णायक मोड़ पर खड़ा है. पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने यह संकेत दिया है कि वे अपने विरुद्ध चल रहे मामलों का सामना करने के लिए बांग्लादेश लौटना चाहती है. बांग्लादेश की का राजनीति सबसे जटिल पक्ष उसकी प्रतिशोध की संस्कृक्ति रही है. आज यदि शेख हसीना स्वदेश लौटने की तैयारी कर रही है, तो उन्हें यह भी याद रखना होगा कि उनके प्रमुख राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी तारिक रहमान लगभग 17 वर्षों तक निर्वासन का जीवन जीते रहे. यह उस समय हुआ था जब बांग्लादेश में शेख हसीना की सत्ता थी और तारिक रहमान के खिलाफ दर्ज कई मामलों के पीछे राजनीतिक
प्रतिशोध की भावना भी थी. अब जब बांग्लादेश की सत्ता का राजनीतिक संतुलन बदल चुका है, तो यह प्रश्न स्वाभाविक है कि क्या तारिक रहमान और उनके सहयोगी शेख हसीना के प्रति उदार राजनीतिक व्यवहार अपनाएंगे या अतीत की कटुता वर्तमान निर्णयों को प्रभावित करेगी. बांग्लादेश की राजनीति अब केवल अवामी लीग और बीएनपी तक सीमित नहीं रह गई है. देश में इस्लामी राजनीतिक दलों का प्रभाव बढ़ा है, जबकि 2024 के जनआंदोलन से उभरे छात्र नेतृत्व ने भी अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान शेख हसीना के विरोध के कारण ही बनाई है. इन सभी शक्तियों की प्राथमिकताएं और राजनीतिक लक्ष्य अलग-अलग हैं. ऐसी परिस्थिति में शेख हसीना की वापसी केवल एक न्यायिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि अनेक राजनीतिक हितों के टकराव का केंद्र बन सकती है. कट्टरपंथी ताकतों का प्रभाव, युवाओं का विरोध और पाकिस्तान की साजिशों के बीच शेख हसीना की वतन वापसी बेनजीर
भुट्टो की तरह तो हो सकती है लेकिन उसका परिणाम बेहद जानलेवा हो सकता है. पाकिस्तान की पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो ने तमाम सुरक्षा आशंकाओं को दरकिनार करके 2007 में स्वदेश वापसी की थी लेकिन तत्कालीन सैन्य तानाशाह ने आतंकियों से मिलकर उनकी हत्या करवा दी थी. बांग्लादेश और पाकिस्तान की राजनीतिक परिस्थितियां भिन्न है, लेकिन कट्टरपंथी ताकतें दोनों तरफ हावी है. इसी कारण शेख हसीना की संभावित वापसी को केवल एक राजनीतिक घटना के रूप में
नहीं देखा जाना चाहिए, यह बांग्लादेश की लोकतांत्रिक परिपक्वता, कानून के शासन और राजनीतिक सहिष्णुता की भी परीक्षा होगी. यदि सभी पक्ष प्रतिशोध के बजाय संवैधानिक प्रक्रिया और लोकतांत्रिक मर्यादाओं का पालन करते है, तो यह देश के लिए एक नई शुरुआत हो सकती है. लेकिन यदि अतीत की कटुताएं वर्तमान पर हावी रही, तो बांग्लादेश एक बार फिर लंबे राजनीतिक टकराव और अस्थिरता के दौर में प्रवेश कर सकता है. शेख हसीना पिछले डेढ़ दशक तक बांग्लादेश की सबसे प्रभावशाली राजनीतिक नेता रही है. उनके नेतृत्व में देश ने आर्थिक विकास, आधारभूत संरचना, महिला सशक्तीकरण और डिजिटल परिवर्तन के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल की. कभी गरीब देश कहे जाने वाले बांग्लादेश ने रेडीमेड गारमेंट उद्योग, सामाजिक विकास और मानव विकास सूचकांकों में ऐसी प्रगति की कि विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने भी उसकी सराहना की. लेकिन विकास के
इतर लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर किया गया, चुनावों की निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न लगे, मीडिया की स्वतंत्रता सीमित हुई और असहमति के स्वर को दबाया गया. इसी कारण शेख हसीना को भागना पड़ा और व्यापक जनाक्रोश और राजनीतिक उथल-पुथल ने सत्ता परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त किया. अब शेख हसीना वापस लौटकर अपने राजनीतिक दल अवामी लीग में जान फूंकना चाहती है. बांग्लादेश की सबसे पुरानी और प्रभावशाली राजनीतिक पार्टी अवामी लीग आज अपने इतिहास के सबसे कठिन दौर से गुजर रही है. 1949 में स्थापित इस दल ने देश के स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्व किया और लंबे समय तक बांग्लादेश की राजनीति का केंद्र बना रहा. शेख हसीना के नेतृत्व में लगातार कई चुनाव जीतने वाली अवामी लीग ने आर्थिक विकास, आधारभूत संरचना, महिला सशक्तीकरण और भारत के साथ रणनीतिक संबंधों को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
