
इंदौर. मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने पॉक्सो मामले में आरोपी एक पिता को उसकी 14 वर्षीय बेटी की अभिरक्षा सौंपने का आदेश दिया है. खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान नाबालिग की इच्छा, उसकी पढ़ाई और भविष्य को प्रमुख आधार मानते हुए यह निर्णय सुनाया. साथ ही उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए भी आवश्यक निर्देश जारी किए हैं.
मामले की शुरुआत वर्ष 2020 में पति पत्नी के बीच हुए पारिवारिक विवाद से हुई थी. अगले वर्ष मां ने पति पर छोटी बेटी के यौन उत्पीड़न का आरोप लगाते हुए पॉक्सो अधिनियम के तहत प्रकरण दर्ज कराया, जिसके चलते पिता को 51 दिन जेल में रहना पड़ा. हालांकि ट्रायल के दौरान नाबालिग ने अपने लिखित बयान में आरोपों से पिता को निर्दोष बताते हुए कहा कि उसने मां के दबाव में पहले बयान दिए थे. इसी बीच बाल संरक्षण समिति ने प्रशासनिक कार्रवाई के तहत बच्ची को आश्रय गृह भेज दिया. इसके विरोध में पिता और बड़ी बहन ने हाई कोर्ट में हेबियस कॉर्पस याचिका दायर की. सुनवाई के दौरान न्यायाधीशों ने सभी पक्षों से अलग अलग बातचीत की. नाबालिग ने पिता के साथ रहने की इच्छा जताते हुए बताया कि वह उनके साथ खुद को सुरक्षित महसूस करती है और आईआईटी की तैयारी करना चाहती है. बड़ी बहन ने भी वैवाहिक विवाद के चलते मां द्वारा छोटी बहन पर दबाव बनाने की बात कही.
सभी परिस्थितियों पर विचार करने के बाद खंडपीठ ने माना कि नाबालिग अपने हितों को समझने में सक्षम है. ऐसे में उसकी इच्छा और भविष्य को ध्यान में रखते हुए अभिरक्षा पिता को सौंपना उचित होगा. साथ ही निर्देश दिए गए कि बच्ची को मोबाइल फोन उपलब्ध कराया जाए, जिसमें स्थानीय थाना प्रभारी का नंबर पहले से सुरक्षित रहे, ताकि आवश्यकता पड़ने पर वह तत्काल पुलिस से संपर्क कर सके. हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह आदेश केवल नाबालिग की अभिरक्षा से संबंधित है. पॉक्सो प्रकरण की सुनवाई कर रही ट्रायल कोर्ट इस आदेश में की गई टिप्पणियों से अप्रभावित रहकर साक्ष्यों के आधार पर स्वतंत्र रूप से सुनवाई और निर्णय करेगी.
