सतना: शहर में पिछले एक सप्ताह से हो रही गंदे और बदबूदार पानी की सप्लाई ने नगर निगम और ठेका कंपनी की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. शहरवासियों को शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने के उद्देश्य से गुजरात की कृष्णा कंस्ट्रक्शन कंपनी को 6 करोड़ 87 लाख रुपये का भारी-भरकम ठेका दिया गया था. पांच साल की अवधि के इस ठेके को अभी महज 9 महीने ही बीते हैं और कंपनी के दावों की पूरी पोल खुल चुकी है. करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाने के बाद भी जनता को बीमारियों की गर्त में धकेलने वाला दूषित पानी सप्लाई किया जा रहा है
विभागीय सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, वाटर फिल्टर प्लांट में आने वाले कच्चे पानी का टीडीएस लगभग 580 से 600 के बीच रहता है. नियमों और मानकों के मुताबिक, इसे सही तरीके से प्रोसेस करके 250 से 300 टीडीएस पर लाकर ही शहर में सप्लाई किया जाना चाहिए. इसके बावजूद शहर की पाइपलाइनों से घरों तक पहुँच रहा पानी न तो साफ है और न ही पीने के योग्य. हालांकि वर्तमान में पानी को शुद्ध करने के लिए फिल्टर प्लांट में 50 पीपीएम एलम और 5 पीपीएम क्लोरीन का उपयोग करने का दावा किया जा रहा है, लेकिन यह प्लांट पानी को पूरी तरह साफ करने में नाकाम साबित हो रहा है. वहीं, फ़िल्टर प्लांट के पानी का पीएच मान फिलहाल 7 से 8 के बीच बना हुआ है.
विशेषज्ञों और विभागीय जानकारों का मानना है कि वाटर फिल्टर प्लांट में पानी को पूरी तरह शुद्ध और पीने योग्य बनाने के लिए कच्चे पानी की नियमित रूप से लैब टेस्टिंग की जानी चाहिए, ताकि पानी में मौजूद गंदगी के आधार पर रसायनों का सही और सटीक अनुपात तय किया जा सके. प्लांट में आने वाले बदबूदार और दूषित पानी को सबसे पहले एरेशन प्रक्रिया से गुजारना बेहद जरूरी है, जिससे पानी को हवा के संपर्क में लाकर उसकी हानिकारक गैसों और दुर्गंध को दूर किया जा सके. इसके साथ ही पानी के खराब स्वाद और बदबू को पूरी तरह खत्म करने के लिए एक्टिवेटेड कार्बन फिल्टर का होना बेहद आवश्यक है, लेकिन कृष्णा कंपनी द्वारा इस दिशा में कोई काम नहीं किया जा रहा है.
फिल्ट्रेशन की यह पूरी वैज्ञानिक प्रक्रिया तभी प्रभावी ढंग से काम करती है जब इन सैंड फिल्टरों की नियमित रूप से बैकवाशिंग, यानी उल्टी धार से धुलाई की जाए ताकि उनमें फंसी गंदगी पूरी तरह साफ हो सके. लापरवाही का आलम यह है कि नियमों को ताक पर रखकर काम किया जा रहा है. इसके अलावा, फ़िल्टर प्लांट में हर घंटे पानी के पीएच स्तर, टर्बिडिटी (मटमैलापन) और क्लोरीन की बची हुई मात्रा की बारीकी से जांच करने के लिए चौबीसों घंटे कुशल केमिस्ट की उपस्थिति अनिवार्य है, लेकिन जमीनी स्तर पर इन मानकों की घोर अनदेखी की जा रही है जनता अब सीधे तौर पर नगर निगम के जिम्मेदार अधिकारियों और ठेका कंपनी की मिलीभगत पर सवाल उठा रही है कि आखिर करोड़ों रुपये फूंकने के बाद भी उन्हें जहरनुमा पानी पीने को क्यों मजबूर होना पड़ रहा है.
