कोई भी व्यवस्था न्यायालय से ऊपर नहीं, निरंकुश कार्यप्रणाली स्वीकार्य नहीं: हाईकोर्ट

जबलपुर। मप्र हाईकोर्ट के जस्टिस विवेक अग्रवाल व जस्टिस एके सिंह की युगलपीठ ने न्यायिक जवाबदेही पर कड़ा संदेश देते हुए कहा कि कोई भी व्यक्ति या व्यवस्था न्यायालय से ऊपर नहीं हो सकती। न्यायालय ने उक्त टिप्पणी उस समय की, जब केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) के चेयरमैन की ओर से वीडियो कान्फ्रेंसिंग के माध्यम से व्यक्तिगत उपस्थिति से छूट मांगी गई और उनके हलफनामे का स्पष्टीकरण अधिवक्ता द्वारा देने की पेशकश की गई। हाईकोर्ट ने कहा कि जिन प्रश्नों का संबंध सीधे चेयरमैन के हलफनामें से है, उनका उत्तर उन्हें स्वयं देना होगा। आदेश में अदालत ने दर्ज किया कि प्रस्तुत तर्कों से ऐसा प्रतीत होता है मानो संबंधित अधिकारी न्यायालय से ऊपर हों, जबकि यह कार्यप्रणाली स्वीकार्य नहीं है।

दरअसल यह मामला आयकर अधिकारी सुधीर कुमार गुप्ता की याचिका से जुड़ा है, जिसमें भ्रष्टाचार प्रकरण में अभियोजन स्वीकृति को चुनौती दी गई है। अदालत ने पहले सीबीडीटी चेयरमैन से यह स्पष्ट करने को कहा था कि जब पहले अभियोजन स्वीकृति से इनकार किया गया था, तो बाद में बिना नए साक्ष्य के मंजूरी किस आधार पर दी गई। सुनवाई के दौरान चेयरमैन की ओर से कार्यकाल समाप्त होने का हवाला देकर व्यक्तिगत उपस्थिति से छूट मांगी गई। हाईकोर्ट ने यह आवेदन खारिज करते हुए कहा कि न्यायालय के प्रश्नों का उत्तर देने से केवल पद छोडऩे के आधार पर बचा नहीं जा सकता। हाईकोर्ट ने निर्देश दिए कि 15 जुलाई को अगली सुनवाई में वर्तमान चेयरमैन और उनके उत्तराधिकारी, दोनों वीडियो कान्फ्रेंसिंग के माध्यम से उपस्थित रहेंगे। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि न्यायिक आदेशों के पालन का दायित्व सभी प्राधिकारियों पर समान रूप से लागू होता है।

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