
जबलपुर। हाईकोर्ट जस्टिस विवेक अग्रवाल तथा जस्टिस ए के सिंह की युगलपीठ ने अपने महत्वपूर्ण आदेश में कहा है कि कानून का यह स्थापित नियम है कि सजा जितनी कड़ी होगी, सबूत भी उतने ही पुख्ता होने चाहिए। दोषसिद्धि केवल अनुमानों और अटकलों पर आधारित नहीं हो सकती। शक चाहे कितना भी गहरा क्यों न हो, वह सबूत की जगह नहीं ले सकता। युगलपीठ ने उक्त आदेश के साथ जिला न्यायालय के आदेश को निरस्त करते हुए दोनों अपीलकर्ता को दोषमुक्त कर दिया।
पन्ना निवासी प्रेम नारायण उर्फ अंगद तथा परमानंद उर्फ सिक्की ने हत्या के अपराध में जिला न्यायालय द्वारा आजीवन कारावास की सजा से दंडित किये जाने के खिलाफ उक्त अपील दायर की थी। अपील में कहा गया था कि पूरा मामला परिस्थितिजन्य सबूतों पर आधारित है। अपीलकर्ताओं के खिलाफ परिस्थितियों की पूरी कड़ी साबित नहीं हुई है। उन्हें मृतक जमुना प्रसाद पटेल के साथ आखिरी बार साथ देखे जाने के सबूत के आधार पर सजा से दंडित किया गया है।
युगलपीठ ने सुनवाई के दौरान पाया कि गवाहों के अनुसार मृतक तथा अपीलकर्ता के खेत आपस में लगे हुए थे और वह अक्सर अपने खेत में साथ जाते थे। घटना दिनांक के दिन भी तीनों साथ गये थे। पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार मृतक शराब का सेवन किये हुए थे। मृतक के नाक और मुँह से खून बह रहा था। इसके अलावा पुलिस द्वारा हथियार के तौर पर जब्त किये गये पत्थर में खून नहीं पाया गया था। उसमें सिर्फ मिट्टी लगी हुई थी।
युगलपीठ ने अपने आदेश में कहा है कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार मृत्यु का कारण चोट आना है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार भी मृतक नशे में था। सिर्फ संभावना के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता है। सबूतों की ऐसी पूरी कड़ी होनी चाहिए जिससे इस निष्कर्ष पर पहुॅचा जा सके की यह काम आरोपी ने किया होगा। आखिरी बार साथ देखे जाने वाली बात यहाँ लागू नहीं होती क्योंकि अक्सर अपीलकर्ता और मृतक अपने खेतों में एक साथ जाते थे। परिस्थितिजन्य सबूतों की कसौटी पर मामला खरा नहीं उतर रहा है। बुनियादी सिद्धांत है कि अदालत द्वारा दोषी ठहराए जाने से पहले आरोपी का दोषी होना जरूरी है। सिर्फ दोषी होने की संभावना से पक्के निष्कर्षों तक नहीं पहुंचा जा सकता है। युगलपीठ ने दोषसिद्धि के फैसले को निरस्त करते हुए दो अपीलकर्ताओं को दोषमुक्त कर दिया।
