नयी दिल्ली, 24 जून (वार्ता) केंद्रीय इस्पात और भारी उद्योग मंत्री एचडी कुमारस्वामी ने देश के इस्पात क्षेत्र के भविष्य के लिए डिजिटलीकरण को बुनियादी जरूरत बताते हुए कहा कि आगे इस क्षेत्र में सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि कोई उद्योग कितना स्मार्ट, समन्वित और डाटा संचालित है।
श्री कुमारस्वामी बुधवार को यहां ‘इस्पात क्षेत्र में डिजिटलाइजेशन’ विषय पर केन्द्रित चिंतन शिविर-2026 को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा, ‘डिजिटलीकरण अब केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि भारत के इस्पात उद्योग के “दीर्घकालिक अस्तित्व का बुनियादी आधार” है। उन्होंने इस बात पर विशेष बल दिया कि वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बने रहने के लिए इस क्षेत्र को उभरती हुई प्रौद्योगिकियों को अपनाना ही होगा।
उन्होंने कहा कि डिजिटलीकरण और स्वचालन से उत्पादकता में उल्लेखनीय सुधार हो सकते है, ऊर्जा खपत को अनुकूलित कर सकते है, परिचालन लागत कम की जा सकती है और ऐसी पूर्वानुमानित रखरखाव प्रणालियों को सक्षम बना सकते हैं, जो उपकरण खराब होने से पहले ही उसकी पहचान कर लेतें हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे उपायों से अनियोजित रुकावटों को कम करने, मानवजनित भूलों को रोकने और कार्यस्थल पर सुरक्षा बढ़ाने में मदद मिलेगी। इस्पात मंत्री ने कहा कि इस उद्योग का भविष्य केवल उसकी उत्पादन क्षमता से तय नहीं होगा, बल्कि इस बात से तय होगा कि वो कितना बुद्धिमत्तापूर्ण, संयोजित और डेटा-संचालित विनिर्माण का पारिस्थितिकी तंत्र बनाने में सक्षम है।
वर्ष 2047 तक भारत को ‘विकसित भारत’ बनाने के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सपने का उल्लेख करते हुए श्री कुमारस्वामी ने इस्पात क्षेत्र को भारत के आर्थिक रुपांतरण का एक रणनीतिक स्तंभ बताया, जो बुनियादी ढांचे के निर्माण, विनिर्माण, नवीकरणीय ऊर्जा, शहरीकरण, परिवहन और रक्षा उत्पादन को गति दे रहा है। उन्होंने कहा कि “इस्पात राष्ट्र-निर्माण का आधार है”। कई उन्नत अर्थव्यवस्थाओं में इस्पात की मांग सुस्त रहने के बावजूद भारत में 2018 से लगातार विश्व के दूसरे सबसे बड़े इस्पात उत्पादक के रूप में अपना स्थान बनाए रखा है। वित्त वर्ष 2021-22 से कच्चे इस्पात के लगभग आठ प्रतिशत औसत वार्षिक दर से वृद्धि हुई है, जबकि तैयार इस्पात की खपत में सालाना लगभग 13 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई है, जो मजबूत घरेलू मांग और तीव्र औद्योगीकरण को दर्शाती है।
श्री कुमारस्वामी ने भारत की इस्पात उत्पादन क्षमता को 2030 तक 30 करोड़ टन और 2035 तक 40 करोड़ टन तक बढ़ाने के सरकार के दीर्घकालिक विजन को दोहराया। हालांकि, उन्होंने आगाह किया कि इन लक्ष्यों को हासिल करने के लिए इस्पात उद्योग को कच्चे माल की सुरक्षा, परिचालन दक्षता, कार्बन उत्सर्जन में कमी, आधुनिकीकरण और निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता से जुड़ी चुनौतियों का एक साथ समाधान करना होगा। प्रौद्योगिकी की परिवर्तनकारी क्षमता पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता, मशीन लर्निंग, औद्योगिक इंटरनेट ऑफ थिंग्स, डिजिटल ट्विन्स, रोबोटिक्स और उन्नत डेटा एनालिटिक्स वैश्विक स्तर पर इस्पात विनिर्माण को नए सिरे परिभाषित कर रहे हैं और इन्हें भारत में बड़े पैमाने पर अपनाया जाना चाहिए। इस्पात मंत्रालय के तत्वाधान में आयोजित इस चिंतन शिविर में एआई-आधारित खनन समाधान, इस्पात संयंत्रों का डिजिटल रूपांतरण, पीएम गति शक्ति, उद्योग 4.0 अनुप्रयोगों तथा व्यावसायिक प्रभावों से जुड़े अध्ययन विषयों पर विशेष सत्र रखे गये। इसमें प्रमुख स्टार्टअप और हितधारकों ने भी भाग लिया और इस क्षेत्र में प्रौद्योगिकीय परिवर्तन को तेज करने के उपायों पर चर्चा की। इस कार्यक्रम में मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ-साथ इस्पात क्षेत्र से जुड़े सरकारी और निजी क्षेत्र के प्रमुख उपक्रमों के शीर्ष अधिकारियों तथा अनेक स्टार्टअप्स और प्रौद्योगिकी विशेषज्ञों ने भाग लिया।

