महापौर-अध्यक्ष किनारे, पार्षद हुए लामबंद

विंध्य की डायरी

डा. रवि तिवारी

रीवा नगर निगम में सब कुछ ठीक-ठाक नहीं चल रहा है । यहां महापौर और अध्यक्ष दोनों अलग-अलग दल से है और इस समय दोनों से कांग्रेस और भाजपा के पार्षद नाखुश चल रहे है. कांग्रेस और भाजपा के पार्षदों का एक साथ आना , नई सियासी चर्चाओं को गर्म कर दिया है. कांग्रेस पार्षद महापौर अजय मिश्रा के नेतृत्व में प्रतिनिधित्व कर रहे हैं तो वहीं भाजपा की ओर से निगम स्पीकर व्यंकटेश पाण्डेय को नेता माना जा रहा है. दोनो दलों के पार्षदों ने जन समस्याओं को लेकर अपने उक्त नेताओं के सामने बात रखी पर समाधान शून्य रहा. लिहाजा संयुक्त मोर्चा का गठन किया, जिसमें वह पार्षद शामिल है जिन्होने कुछ समय पहले अलग-अलग बैठकों में न पहुंचकर स्पीकर और महापौर के प्रति नाराजगी जाहिर की थी. अब दोनो दलो के पार्षद बगावत की तैयारी में है. दरअसल शहर में पेयजल और सीवरेज की वजह से पार्षदों की सूचनाओं पर निगम प्रशासन की उदासीनता के लिये आखिरकार सब्र टूट गया. परिणाम स्वरूप महापौर एवं स्पीकर को किनारे कर दोनो दलों के पार्षद आयुक्त से मिलने पहुंचे और जनता की समस्या को रखते हुए अल्टीमेटम भी दिया. आयुक्त के आश्वासन पर पार्षद फिलहाल शांत हो गये है लेकिन काम नही होगा तो चेतावनी के मुताबिक आंदोलन की राह पर चले जाएगे. साल भर से कम का कार्यकाल बचा है, ऐसे में महापौर एवं स्पीकर के प्रति नाराजगी का गुबार फूटने लगा है.

विधायक बोलीं मोर बप्पा रे……..

प्रशासन में बैठे जिम्मेदार अफसर अपनी जिम्मेदारियों से भाग रहे है. जरूरतमंद और दिव्यांग की समस्याओं का समाधान नही हो रहा है. सीधी जिले में सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र सेमरिया में विश्व सिकल सेल दिवस के शिविर में एक भावुक दृश्य सामने आया, जिसने सभी को हैरान कर दिया. जब एक दिव्यांग आदिवासी महिला सीधी विधायक रीती पाठक के पैरो को पकड़ कर अपनी पीड़ा सुनाने लगी. लम्बे समय से ट्राई साइकिल के लिये भटक रही दिव्यांग ने अपनी व्यथा जब सुनाई तो विधायक आश्चर्यचकित रह गई और सिर पर हाथ रखकर कहा मोर बप्पा रे…….अभी तक ट्राय साइकिल नही मिली, फिर पैर छोडऩे के लिये कहा. यह तस्वीर बता रही थी कि प्रशासन में बैठे अधिकारी दिव्यांगों तक की नही सुनते. जरूरतमंद कार्यालयों का चक्कर काटते रहते हैं पर कोई सुनवाई नही होती. ऐसे अफसरो के चलते ही सरकार की जनता के बीच किरकिरी हो रही है. अफसरों की संवेदनशीलता शायद खत्म होती जा रही है. रसूखदार के लिये नियम भी ताक में रख दिये जाते है लेकिन एक मजबूर और दिव्यांग आदिवासी महिला पर तरस भी नही खाते हैं .

ट्रांसफर सूची ने निराश किया

इस समय ट्रांसफर का मौसम चल रहा है . हर किसी ने अपने-अपने हिसाब से गुणा-गणित कर मनचाहे स्थान पर पदस्थापना के लिये परिश्रम किया. हर संभव प्रयास के साथ अपने शहर से मुख्यालय तक की दौड़ लगाई, नेता, मंत्री से भी गुहार लगाई. इतना ही नही जो सिस्टम है ट्रांसफर का , उसे भी फालो किया पर क्या पता था कि जब सूची जाएगी तो नाम ही गायब रहेगा. विभिन्न विभागों की सूचियां देर रात बाहर आई लेकिन जब अधिकारियों-कर्मचारियों का नाम सूची में नही दिखा तो निराशा हाथ लगी. जिनके हाथो में अपने ट्रांसफर की जिम्मेदारी सौप कर आए थे उन्हे फोन मिलाते रहे पर ही एक जवाब था साहब की भी नही चली, सूची ऊपर से बनकर आई है. कई अधिकारी विंध्य से बाहर गए तो कुछ आए भी. जिनको कभी भरोसा नहीं था उनका भी स्थानान्तरण बाहर हो गया. यह बात और है कि राजनीति का शिकार कई अधिकारी हुए हैं.

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