
नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल की राजनीति में आए बड़े उलटफेर के बीच एक अपेक्षाकृत छोटे राजनीतिक दल जिसने दो विधानसभा चुनाव में महज आठ सौ से कुछ अधिक वोट पाये अचानक 20 सांसदों के साथ राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा बटोर ली है। इस घटनाक्रम के केंद्र में नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) और उसके उपाध्यक्ष उतिया कुंडु का नाम सामने आया है।
NCPI उस समय चर्चा में आई जब तृणमूल कांग्रेस (TMC) के करीब 20 बागी लोकसभा सांसदों ने इस दल में विलय की घोषणा की। इन सांसदों ने पार्टी नेतृत्व से असहमति जताते हुए अलग रास्ता अपनाने का फैसला किया और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) को समर्थन देने के संकेत दिए।
उतिया कुंडु इस पूरी राजनीतिक हलचल में इसलिए महत्वपूर्ण हो गए हैं क्योंकि वे NCPI के प्रमुख पदाधिकारियों में शामिल हैं। पार्टी के गठन और संगठनात्मक गतिविधियों में कुंडु दंपती की भूमिका रही है।
कैसे सुर्खियों में आई NCPI
NCPI का गठन हाल के वर्षों में हुआ था और चुनावी राजनीति में उसका प्रभाव सीमित रहा है। पार्टी ने 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन उसे बड़ी सफलता नहीं मिली थी। इसके बावजूद टीएमसी के बागी सांसदों के जुड़ने की घोषणा के बाद पार्टी अचानक संसद की राजनीति में चर्चा का केंद्र बन गई।
बागी सांसदों का कहना है कि वे टीएमसी से अलग होकर भी राजनीतिक लड़ाई जारी रखेंगे और पार्टी के नाम व चुनाव चिह्न पर दावा करने की बात कही है। इस मुद्दे पर आगे कानूनी और संवैधानिक प्रक्रिया महत्वपूर्ण होगी।
राजनीतिक विश्लेषकों के लिए यह घटनाक्रम इसलिए अहम है क्योंकि एक छोटे दल के जरिए बड़ी संख्या में सांसदों का एक मंच पर आना भारतीय राजनीति में दल-बदल कानून, पार्टी की मान्यता और संसदीय समीकरणों को लेकर नई बहस खड़ी कर सकता है।
फिलहाल उतिया कुंडु और NCPI की भूमिका पश्चिम बंगाल की राजनीति में बदलते समीकरणों के बीच चर्चा का विषय बनी हुई है। आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि यह गठजोड़ स्थायी राजनीतिक ताकत बनता है या केवल मौजूदा राजनीतिक संकट का एक चरण साबित होता है।
