
शाजापुर, वाह! क्या मौसम है. हल्की सी हवा चली नहीं कि बिजली विभाग के कर्मठ कर्मचारियों ने राष्ट्रहित में सुरक्षात्मक कदम उठा लिए. आखिर तेज हवा में अगर आपके घर का कोई तार हिल गया, तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा. इसलिए हमारे भले के लिए, बिना मांगे ही बिजली काट दी जाती है. इसे कहते हैं बचत भी, सुरक्षा भी. आजकल हमारे शहर में एक नया उत्सव चल रहा है, जिसका नाम है दैनिक मेंटेनेंस उत्सव. यह उत्सव रोजाना नियम से चार घंटे मनाया जाता है. इस उत्सव का मुख्य उद्देश्य जनता को आदिम युग की याद दिलाना और उनमें धैर्य की भावना विकसित करना है.
शहरवासी इस बेतहाशा कटौती से बेहाल हैं. लोग पसीने से तर-बतर होकर बिजली दफ्तर फोन लगाते हैं, तो वहां से बड़ा ही दार्शनिक जवाब मिलता है साहब, मेंटेनेंस चल रहा है. अब कोई इस नासमझ जनता को समझाए कि मेंटेनेंस एक पवित्र प्रक्रिया है. यह वो अदृश्य काम है, जो पिछले कई सालों से आए दिन चार से पांच घंटे चल रहा है, लेकिन आज तक पूरा नहीं हुआ. यह शहर की बिजली का डिजिटल कायाकल्प है, जो सिर्फ कागजों और कटौती में दिखाई देता है. जरा सोचिए, अगर रोज चार घंटे बिजली नहीं जाएगी, तो मोमबत्ती और इन्वर्टर उद्योग का क्या होगा. क्या आप देश की अर्थव्यवस्था को डुबाना चाहते हैं. जनता सोचती है कि उनके चुने हुए नेता इस अंधेरे के खिलाफ आवाज उठाएंगे. अरे भाई! नेताओं को इस छोटे-मोटे अंधकार से क्या लेना-देना. उनके बंगलों पर इनवर्टर/जनरेटर का शोर और एसी की ठंडी हवा इस कदर गूंजती है कि जनता की चीखें उन तक पहुंच ही नहीं पातीं.
बिजली कटौती को लेकर कांग्रेस भी मौन है, सत्ता पक्ष गौण है…
जब दिग्गी राज में लाइट जाती थी, तो भाजपा नेता सडक़ों पर आ जाते थे, लेकिन अब विपक्ष में कांग्रेस बिजली कटौती को लेकर पूरी तरह मौनी बाबा बनी हुई है और सत्ता पक्ष के पास समय नहीं है कि वे बिजली विभाग से पूछें कि रोज मेंटेनेंस और कटौती क्यों हो रही है. बिजली विभाग के अधिकारियों के पास रटेरटाये जवाब हैं. फीडर चैंज कर रहे हैं. इसलिए लाइट बंद की जा रही है. यदि ये मेंटेनेंस सही मायने में हुआ है, तो शाजापुर की लाइट दो साल तक बंद नहीं होगी. लेकिन मेंटेनेंस के नाम पर जनता को सिर्फ भीषण गर्मी में परेशान किया जा रहा है.
हर दूसरे दिन हो रहा मेंटनेंस…
शहर में बिजली की स्थिति यह है कि हर दूसरे दिन मेंटेनेंस के नाम पर लाइट बंद रहती है. समझ नहीं आ रहा कि आखिर इतना मेंटेनेंस किस बात का हो रहा है. मेंटेनेंस को देखकर ऐसा लगता है कि शहर में अब दो-तीन साल तक लाइट ही नहीं जाएगी. सबसे बड़ी बात यह है कि मेंटेनेंस तब करते हैं जब सभी सरकारी कार्यालय बंद रहते हैं. ताकि अधिकारियों को इस बिजली कटौती से परेशान न होना पड़े. रही बात जनता की तो जनता की स्थिति पर किसी का ध्यान नहीं है. इस भीषण गर्मी में लाइट की रोज कटौती ने जनता को बेहाल कर रखा है. कभी दिन में, कभी रात में, कभी सुबह, कभी दोपहर, कभी भी लाइट बंद हो जाती है.
चार घंटे की कटौती से क्या घबराना…
हमारे नेताओं का मानना है कि अंधेरा तो मन का वहम है. जब दिल में राजनीति का उजियारा हो, तो चार घंटे की कटौती से क्या घबराना. वैसे भी, चुनाव अभी दूर हैं. जब चुनाव पास आएंगे, तब यही नेता लालटेन लेकर आएंगे और कहेंगे देखिए, मैं आपके अंधेरे को महसूस करने आया हूं. अभी तो वे बड़े-बड़े दौरों पर हैं, एसी रूम में बैठकर शहर के उज्जवल भविष्य का ब्लूप्रिंट तैयार कर रहे हैं. उन्हें डिस्टर्ब करना पाप है.
