
जबलपुर। मप्र हाईकोर्ट के जस्टिस विवेक जैन की एकलपीठ ने एक मामले में स्पष्ट किया है कि न्याय का अर्थ केवल फैसला सुनाना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि हकदार पक्ष को अपना पक्ष साबित करने का पूरा अवसर मिले। जिस पर नाबालिगों के मुआवजा दावे में आवश्यक दस्तावेजों पर विचार किए बिना अंतिम निर्णय नहीं किया जा सकता। किसी मुकदमे में अंतिम निर्णय की जल्दबाजी ऐसी न हो कि वास्तविक हकदारों को अपने दावे के समर्थन में आवश्यक दस्तावेज प्रस्तुत करने का अवसर ही न मिले। विशेषकर तब, जब मामला नाबालिग बच्चों के अधिकारों और मृतक श्रमिक के मुआवजे से जुड़ा हो। इसी व्यापक सिद्धांत को रेखांकित करते हुए हाईकोर्ट ने श्रम न्यायालय को निर्देशित किया है कि अंतिम फैसला सुनाने से पहले आवश्यक दस्तावेज प्रस्तुत कराने संबंधी आवेदन पर निर्णय किया जाए।
दरअसल, यह आदेश सिवनी निवासी मृत श्रमिक कुलपत दास के नाबालिग बच्चों की याचिका पर पारित किया। याचिकाकर्ताओं की ओर से कहा गया था कि उनके पिता की कार्यस्थल से जुड़ी मृत्यु के बाद कर्मचारी क्षतिपूर्ति अधिनियम के तहत मुआवजे का दावा लंबित है। अंतिम बहस पूरी होने के बाद बच्चों को पता चला कि उनके पिता के रोजगार संबंधी कुछ महत्वपूर्ण दस्तावेज रिकार्ड पर नहीं हैं। चूंकि वे नाबालिग हैं और दस्तावेज उनके पास नहीं हैं, इसलिए उन्होंने सीपीसी के आदेश 11 नियम 14 के तहत दस्तावेज तलब करने का आवेदन प्रस्तुत किया था। याचिका में कहा गया था कि आवेदन के साथ शीघ्र सुनवाई का निवेदन भी किया गया, लेकिन श्रम न्यायालय ने उस पर विचार किए बिना प्रकरण को अंतिम निर्णय की ओर बढ़ा दिया। इस पर हाईकोर्ट ने कहा कि जब विवाद मुआवजे के दावे और नाबालिग बच्चों के अधिकारों से जुड़ा है, तब दस्तावेजों की मांग संबंधी आवेदन पर पहले निर्णय किया जाना आवश्यक है। न्यायालय ने श्रम न्यायालय को निर्देश दिया कि अंतिम निर्णय पारित करने से पूर्व उक्त आवेदन का निराकरण किया जाए। साथ ही स्पष्ट किया कि यदि आवेदन खारिज किया जाता है तो याचिकाकर्ताओं को उस आदेश को चुनौती देने के लिए उचित समय भी दिया जाए। इसी निर्देश के साथ याचिका का निराकरण कर दिया गया।
