पीओके में विरोध प्रदर्शन के बाद कर्फ्यू, पुलिस हिंसा में पिछले चार दिनों में कम से कम 41 की मौत

नयी दिल्ली, 09 जून (वार्ता) पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) में मंगलवार दोपहर कई शहरों में विरोध प्रदर्शन फैलने के बाद प्रशासन ने कर्फ्यू लागू कर दिया, जबकि पुलिस हिंसा में पिछले चार दिनों में कम से कम 41 लोगों की मौत हो गयी जिनमें 19 बच्चे और सात गर्भवती महिलाएं शामिल हैं।

सूत्रों के अनुसार, रावलकोट, मुज़फ्फराबाद, कोटली, भिंबर, दादयाल, पलांद्री एवं सुधनोती में हजारों लोगों ने सड़क पर उतरकर सरकार एवं सेना विरोधी नारे लगाये और आज़ादी की मांग उठाई। प्रशासनिक बंद के कारण मुजफ्फराबाद, कोटली, भिंबर, और दादयाल में आम जनजीवन ठप पड़ गया, जबकि पुलिसिया कार्रवाई में 70 से ज्यादा लोग घायल हो गये।

रावलकोट में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन अपराह्न 11 बजे शुरू हुआ। प्रदर्शनकारियों ने मेन रोड को जाम कर दिया, जिसके जवाब में पाकिस्तान पुलिस, सेना और रेंजर्स ने गोलीबारी, पेलेट गन एवं आंसू गैस का इस्तेमाल किया। सूत्रों के अनुसार, प्रशासनिक कार्रवाई में कम से कम सात लोग घायल हो गये।

सूत्रों के अनुसार, कोटली और दादयाल में भी बड़ी तादाद में लोगों को सड़कों पर उतरकर नारेबाज़ी करते हुए तथा रावलकोट की ओर बढ़ते हुए देखा गया। पलांद्री में आंसू गैस के इस्तेमाल के बावजूद हजारों लोगों ने सड़क पर उतरकर पाकिस्तानी सरकार का विरोध किया। इस बीच, सुधनोती में प्रदर्शनकारियों ने लकड़ी की छड़ें लेकर प्रदर्शन किया और पाकिस्तानी सरकार तथा सेना को चेतावनी दी। मुज़फ़्फ़राबाद के नीलम ब्रिज पर प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच झड़पें भी हुई हैं। गोलीबारी के वीडियो सामने आने से तनाव और बढ़ गया है।

उल्लेखनीय है कि पीओके में प्रदर्शनकारी 38 मांगें लेकर सड़कों पर उतरे हैं। इनमें मुख्य रूप से सस्ती बिजली और आटे, चावल व दालों की कम कीमतें शामिल हैं। प्रदर्शनकारियों का तर्क है कि पाकिस्तान ने पीओके के इलाके में मंगला बांध जैसी पनबिजली परियोजनाएं बनाई हैं। उनका कहना है कि यह इलाका पाकिस्तान का हिस्सा नहीं है, इसलिए स्थानीय निवासियों को कम दरों पर बिजली मिलनी चाहिए।

प्रदर्शनकारियों की एक बड़ी राजनीतिक मांग यह भी है कि पीओके विधानसभा में शरणार्थियों के लिए तय 12 सीटों को खत्म किया जाए। ये सीटें उन लोगों के लिए आरक्षित हैं जिन्हें शरणार्थी माना जाता है और जिनके बारे में कहा जाता है कि वे जम्मू-कश्मीर से पाकिस्तान के नियंत्रण वाले कश्मीर चले गये थे, लेकिन अब वे पीओके के बजाय पाकिस्तान के दूसरे हिस्सों में रहते हैं। प्रदर्शनकारी सवाल उठाते हैं कि जो लोग पीओके में नहीं रहते, वे इन 12 सीटों के लिए वोट कैसे दे सकते हैं और उनका प्रतिनिधित्व कैसे कर सकते हैं।

मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, पाकिस्तानी सेना यह सुनिश्चित करती है कि इस्लामाबाद, रावलपिंडी और कराची में रहने के बावजूद, इन आरक्षित सीटों पर हिज़्बुल मुजाहिदीन के सदस्यों और उनके रिश्तेदारों का ही चुनाव हो। नतीजतन, पीओके विधानसभा की 45 में से 12 सीटें आईएसआई और पाकिस्तानी सेना के प्रभाव में रहती हैं। इससे वे विधायकों को प्रभावित कर सकते हैं और ज़रूरत पड़ने पर अपनी पसंद का प्रधानमंत्री नियुक्त कर सकते हैं।

इसका एक उदाहरण अब्दुल्ला सईद शाह है, जिसे पीर मज़हर सईद शाह के नाम से भी जाना जाता है। उसे जैश-ए-मोहम्मद के सिंध प्रांत का प्रमुख बताया जाता है। इस चरमपंथी संगठन में कथित भूमिका के बावजूद वह पीओके विधानसभा का सदस्य है और हाल तक सूचना और प्रसारण मंत्री का पद संभाल रहा था।

पिछले साल अक्टूबर में भी विरोध-प्रदर्शनों की ऐसी ही लहर चली थी, जिसमें 31 लोग मारे गये थे। उन प्रदर्शनों के बाद प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने बातचीत के लिए अपने करीबी सहयोगी और राजनीतिक सलाहकार राणा सनाउल्लाह को पीओके भेजा था। अधिकारियों ने प्रदर्शनकारियों की 38 में से 21 मांगें मान ली थीं। इसके बावजूद, आठ महीने बाद भी वे वादे पूरे नहीं हुए हैं। मौजूदा अशांति के दौरान और उससे पहले भी अधिकारियों ने प्रदर्शनकारियों पर गोलीबारी की है।

सूत्रों ने बताया कि पीओके में आम नागरिकों के ख़िलाफ़ पाकिस्तानी सेना की कार्रवाई पिछले साल ब्रिगेडियर फ़ाइक़ अयूब के आईएसआई सेक्टर कमांडर के तौर पर आने के बाद से और तेज़ हो गयी है। प्रदर्शनकारियों और जानकारों का आरोप है कि उनकी कमान में सेना का दमन काफ़ी बढ़ गया है।

पीओके में पोस्टिंग से पहले, ब्रिगेडियर फ़ाइक़ अयूब पंजाब में सेक्टर कमांडर थे। कहा जाता है कि लाहौर में हुई हिंसक कार्रवाई के लिए वे ही ज़िम्मेदार थे, जिसके कारण उन्हें “लाहौर का कसाई” कहा जाने लगा। इसके बाद लेफ्टिनेंट जनरल आसिम मलिक और फ़ील्ड मार्शल आसिम मुनीर ने उनका तबादला पीओके कर दिया, जहां यह कार्रवाई जारी है।

 

 

 

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