
जबलपुर। हाईकोर्ट के जस्टिस दीपक खोत की एकलपीठ ने देव दत्तात्रेय पब्लिक ट्रस्ट मंदिर सागर के मामले में लोक न्यास गठित करने के विरुद्ध दायर याचिका निरस्त कर दी। न्यायालय ने मामले में स्पष्ट किया कि राज्य को अपनी अधिसूचना वापस लेने का अधिकार है। अधिसूचना वापस लेने के लिए शुरू की गई प्रक्रिया विधि के अनुसार नहीं थी, लेकिन अधिसूचना वापस लेने का अंतिम निर्णय विशुद्ध रूप से प्रशासनिक है और यह पाया गया है कि यह भारत के संविधान के अनुच्छेद 166 के दायरे में मंत्री की स्वीकृति से पारित किया गया है। जिस पर दोष नहीं दिया जा सकता। याचिका में कोई तथ्य नहीं है इसे निरस्त किया जाता है।
दरअसल, मामला अरुण कुमार शेंडे की याचिका से संबंधित था, जिनके निधन के बाद रवि शेंडे कानूनी लड़ाई लड़ रहे थे। उनकी मांग थी कि विवादित आदेश को निरस्त कर दिया जाए। ऐसा इसलिए क्योंकि वह अवैध, दुर्भावनापूर्ण और मध्य प्रदेश लोक न्यास अधिनियम के प्रावधानों के विपरीत है। स्व. विश्वनाथ राव शिंदे ने गौर झामर ग्राम में खसरा संख्या 336, क्षेत्रफल 3.04 एकड़ और खसरा संख्या 343/1ए क्षेत्रफल 0.13 एकड़, कुल 3.17 एकड़ कृषि भूमि खरीदी थी। फतेहपुर गांव में खसरा संख्या 39, क्षेत्रफल 0.45 एकड़, अयोध्या प्रसाद गौर झामर की विधवा रानी बहू द्वारा 2 अप्रैल 1943 को पंजीकृत विक्रय विलेख के माध्यम से श्री देव दत्तात्रेय मंदिर मोहतमिन पंडित विश्वनाथ शिंदे के नाम पर हस्तांतरित किया गया था। मंदिर और कृषि भूमि याचिकाकर्ता के पिता विश्वनाथ राव के अनन्य कब्जे में रही, जो कृषि भूमि से प्राप्त आय से देवता की पूजा करते थे। रानी बहू ने वर्ष 1967 में मध्य प्रदेश लोक न्यास अधिनियम 1951 की धारा 4 के तहत श्री देव दत्तात्रेय मंदिर गौर झामर को लोक न्यास के रूप में पंजीकृत करने के लिए आवेदन किया और जांच के बाद लोक न्यास रजिस्ट्रार सागर ने 23 सितंबर 1970 को श्री देव दत्तात्रेय मंदिर को लोक न्यास के रूप में पंजीकृत करने का आदेश पारित किया।
