नागपुर, (वार्ता) राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख डॉ. मोहन भागवत ने गुरुवार को कहा कि दुनिया को अभी तक ऐसा कोई मार्गदर्शक दर्शन नहीं मिला है जो मानवीय जीवन के सभी पहलुओं में संतुलित प्रगति सुनिश्चित कर सके, वहीं मौजूदा व्यवस्थाएं व्यक्तिगत हितों, सामाजिक कल्याण और पर्यावरणीय चिंताओं के बीच तालमेल बिठाने को लेकर अनिश्चित बनी हुई हैं।
डॉ भागवत ने आज यहां आरएसएस स्वयंसेवकों के प्रशिक्षण शिविर के समापन समारोह को संबोधित करते हुए कहा कि यद्यपि मानवता ने शरीर, मन और बुद्धि के अलग-अलग विकास को समझ लिया है, लेकिन वह ऐसा कोई मॉडल स्थापित करने में विफल रही है जो इन तीनों में एक साथ प्रगति को संभव बना सके।दुनिया शारीरिक विकास को समझती है और बौद्धिक तथा मानसिक विकास को भी, लेकिन उसे इन सभी मोर्चों पर एक साथ आगे बढ़ने का कोई तरीका नहीं मिला है।
वैश्विक संघर्षों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि इनके परिणाम केवल उन देशों तक ही सीमित नहीं रहते जो सीधे तौर पर उनमें शामिल होते हैं, बल्कि उनका प्रभाव पूरी दुनिया पर पड़ता है। अपनी बात को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि किसी एक क्षेत्र में तनाव और युद्ध अक्सर दूसरी जगहों पर रोजमर्रा के जीवन को प्रभावित करते हैं, जिसमें आर्थिक परिणाम भी शामिल हैं, जैसे कि भारत में ईंधन की कीमतों में वृद्धि। उन्होंने जोर दिया कि कठिन परिस्थितियों को केवल अनिश्चितता और संकट के नजरिए से ही नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि उन्हें सीखने और बदलाव के अवसरों के रूप में भी देखा जाना चाहिए।
आरएसएसप्रमुख ने कहा कि दुनिया अभी भी परस्पर विरोधी प्राथमिकताओं से जूझ रही है, जिनमें व्यक्तिगत स्वतंत्रताएं, सामूहिक कल्याण और पारिस्थितिक संरक्षण शामिल हैं। उन्होंने कहा कि व्यक्तिगत अधिकारों पर अधिक जोर देने का परिणाम अक्सर सामाजिक हितों की अनदेखी के रूप में सामने आता है, जबकि समाज को प्राथमिकता देने से कभी-कभी व्यक्तिगत स्वतंत्रताएं सीमित हो सकती हैं।
उन्होंने कहा कि भौतिक प्रगति अक्सर प्राकृतिक संसाधनों के दोहन से जुड़ी होती है, जबकि पर्यावरण की रक्षा के प्रयासों को अक्सर विकास में बाधा के रूप में देखा जाता है। दुनिया इन्हीं विरोधाभासों में उलझी हुई है और उसे इस बात की स्पष्टता नहीं है कि आगे कैसे बढ़ा जाए। वर्तमान में ऐसा कोई भी सर्वमान्य सिद्धांत मौजूद नहीं है जो एक ही समय में समृद्धि, शांति और पर्यावरणीय स्थिरता की गारंटी दे सके। यद्यपि पारंपरिक ज्ञान और दार्शनिक विचारों में संभावित समाधान मिल सकते हैं, लेकिन मानवीय प्रवृत्तियों और सीमाओं के कारण उनका कार्यान्वयन कठिन बना हुआ है।
समग्र विकास के महत्व पर जोर देते हुए डॉ भागवत ने शरीर, मन और बुद्धि के बीच अधिक तालमेल बिठाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि भारत एक महत्वपूर्ण दौर में प्रवेश कर रहा है और दुनिया विकास के लिए संघर्ष-उन्मुख और आत्म-केंद्रित दृष्टिकोणों के विकल्पों की तलाश तेज़ी से कर रही है। उन्होंने जोर दिया कि भारत ऐतिहासिक रूप से ज्ञान, विज्ञान और आर्थिक समृद्धि जैसे क्षेत्रों में अग्रणी रहा है। उन्होंने लोगों से उन मूल्यों और शक्तियों से फिर से जुड़ने का आग्रह किया जो समय के साथ धुंधले पड़ गए हैं।
