नयी दिल्ली, 31 मई (वार्ता) पश्चिम एशिया से तेल की आपूर्ति में बड़े व्यवधान की आशंकाओं के बीच ब्रेंट क्रू़ड की कीमत 120 डॉलर का स्तर पार करने के बाद इस सप्ताह तेजी से गिरकर लगभग 84 डॉलर प्रति बैरल पर आ गयी हैं। यह महज एक महीने पहले की असाधारण तेजी के बाद आयी बड़ी गिरावट है। ब्रेंट क्रूड तेल की कीमतों में यह गिरावट अप्रैल के उच्चतम स्तर से लगभग 30 प्रतिशत के सुधार को दर्शाती है, जब ईरान और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े तनाव की चिंताओं ने ऊर्जा बाजारों में घबराहट पैदा कर दी थी। उस समय व्यापारियों को डर था कि इस संकरे जलमार्ग से जहाजों की आवाजाही में लंबे समय तक रुकावट आने से वैश्विक कच्चे तेल की आपूर्ति गंभीर रूप से प्रभावित हो सकती है, जिससे तेल की कीमतें पिछले कई वर्षों के उच्चतम स्तर पर पहुंच गयी थीं।
इसके बाद से बड़े पैमाने पर आपूर्ति ठप होने का तात्कालिक डर कम होने से बाजार धीरे-धीरे शांत हुआ है। कूटनीतिक बातचीत की बढ़ती उम्मीदों और इस बात के संकेतों ने कि इस क्षेत्र से होने वाली ऊर्जा की आपूर्ति सबसे खराब स्थिति वाले व्यवधान से बच सकती है, कच्चे तेल की कीमतों में बढ़े भू-राजनीतिक फायदे को कम कर दिया है। 29 मई को ब्रेंट क्रूड का वायदा कारोबार लगभग 84.4 डॉलर प्रति बैरल पर था, जबकि अप्रैल के अंत में यह 120 डॉलर से ऊपर के स्तर पर था। यह हालिया गिरावट वैश्विक मांग में वृद्धि को लेकर व्यापक चिंताओं और इस उम्मीद को भी दर्शाती है कि प्रमुख तेल उत्पादक क्षेत्रीय तनाव के बावजूद पर्याप्त आपूर्ति बनाये रख सकते हैं।
भारत के लिए, जो अपनी कच्चे तेल की आवश्यकता का 85 प्रतिशत से अधिक आयात करता है, यह गिरावट ईंधन आयात की बढ़ती लागत पर हफ्तों की चिंता के बाद बड़ी राहत लेकर आयी है। कच्चे तेल की ऊंची कीमतें आमतौर पर मुद्रास्फीति (महंगाई), परिवहन लागत और देश के आयात बिल पर दबाव बढ़ाती हैं। यदि कीमतें स्थिर रहती हैं, तो 80-90 डॉलर के बीच लौटने से इन दबावों को कुछ कम करने में मदद मिल सकती है। विश्लेषकों ने चेतावनी दी है कि तेल बाजार भू-राजनीतिक घटनाक्रमों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील बने हुए हैं। पश्चिम एशिया में तनाव के दोबारा बढ़ने या शिपिंग मार्गों में किसी भी तरह के व्यवधान से एक बार फिर अस्थिरता पैदा हो सकती है और कीमतें ऊपर जा सकती हैं। पिछले एक महीने के दौरान ब्रेंट की कीमतों में आया यह बड़ा उतार-चढ़ाव दिखाता है कि भू-राजनीतिक घटनाएं कितनी तेजी से वैश्विक ऊर्जा बाजारों को नया रूप दे सकती हैं, जहां आपूर्ति में व्यवधान के डर से कीमतें ऊपर भागती हैं और तनाव कम होने पर लगभग उतनी ही तेजी से नीचे आ जाती हैं।

