पांच डॉक्टरों की याचिका खारिज, एफआईआर निरस्त करने से हाईकोर्ट का इंकार

जबलपुर: नेता सुभाष चंद्र बोस मेडिकल कॉलेज में पांच सीनियर छात्रों द्वारा प्रताड़ित किये जाने के कारण जूनियर छात्र ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरित किये जाने के तहत दर्ज एफआईआर तथा ट्रायल कोर्ट में लंबित आपराधिक प्रकरण को खारिज किये जाने की मांग करते हुए सभी पांच डॉक्टरों की तरफ से हाईकोर्ट में याचिका दायर की गयी थी। हाईकोर्ट जस्टिस बी पी शर्मा की एकलपीठ ने याचिका को निरस्त करते हुए अपने आदेश में कहा है कि ऐसा कोई आधार नहीं है कि कार्रवाई को जारी रखना कानून प्रक्रिया का गलत इस्तेमाल होगा। जांच के दौरान एजेन्सी के द्वारा इकट्ठा किये गये साक्ष्य के आधार पर ट्रायल को फैसला सुनाना ज़रूरी है।
याचिकाकर्ता सलमान खान, विकास द्विवेदी व अन्य तीन डॉक्टरों की तरफ से दायर की गयी याचिका में कहा गया था कि भगवत देवांगन नेताजी सुभाष चंद्र बोस मेडिकल कॉलेज जबलपुर में ऑर्थाेपेडिक्स में पोस्ट ग्रेजुएशन कर रहा था। सभी याचिकाकर्ता उससे सीनियर छात्र थे। उसने 1 अक्टूबर 2020 को अपने हॉस्टल के कमरे में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। याचिकाकर्ता उसी डिपार्टमेंट में सीनियर पोस्ट ग्रेजुएट स्टूडेंट थे। मृतक के भाई प्रहलाद व देवी देवांगन की शिकायत पर गढ़ा पुलिस ने सभी याचिकाकर्ताओ के खिलाफ धारा 306 तथा 34 के तहत 3 नवम्बर 2020 को प्रकरण दर्ज करने के बाद न्यायालय में चार्जशीट दायर की थी।

पुलिस ने जांच के दौरान डॉ. अलौकिक गुप्ता, डॉ. रवि दिवाकर, डॉ. नवीन कुमार चोलक, डॉ. प्रणय खंडेलवाल और डॉ. सुमित नाहटा सहित कई गवाहों के धारा 161 और 164 के तहत बयान दर्ज किए थे। पुलिस जांच के अनुसार याचिकाकर्ता सीनियर होने के कारण भगवत को परेशान व बेइज्जत करते हुए रैगिंग करते हुए शारीरिक सज़ा देते थे। नहाने जाते समय भी उस पर हमला किया जाता था और क्षमता से ज्यादा काम करने मजबूर करते थे। ऑपरेशन थिएटर में उसे सज़ा के तौर पर मुर्गे की तरह खड़ा कर बेइज्जत करते थे। याचिकाकर्ता यह जानते हुए भी कि वह पहले से ही डिप्रेशन और मानसिक परेशानी में है, इसके बावजूद भी उसे प्रताडित करते थे। जांच एजेंसी ने मृतक के मोबाइल फोन से भी साक्ष्य एकत्र किये थे।
याचिकाकर्ताओं की तरफ से तर्क दिया गया कि अभियोजन की कहानी को सच मान भी लिया जाये तो उनके खिलाफ धारा 306 धारा 107 के तहत अपराध नहीं बनता है। प्रकरण में ऐसे कोई भी साक्ष्य नहीं है कि याचिकाकर्ताओं ने उसे आत्महत्या के लिए उकसाया था।
आत्महत्या करने वाला मानसिक परेशानी, डिप्रेशन और आर्थिक अस्थिरता से जूझ रहा था। आत्महत्या करने के दौरान उसका मानसिक बीमारी का इलाज चल रहा था और एंग्जायटी और डिप्रेशन की दवाएं ले रहा था। इसके पूर्व भी उसने जुलाई व अगस्त 2020 में गोलियां खाकर आत्महत्या की कोशिश की थी। मेडिकल कॉलेज की एंटी-रैगिंग कमेटी ने पहले भी मामले की जांच कर चुकी है। कमेटी ने जांच में याचिकाकर्ताओं के खिलाफ रैगिंग का कोई मामला नहीं पाया था। मृतक ने खुद एंटी-रैगिंग कमेटी के सामने कोई शिकायत नहीं की थी। सिर्फ परेशान करना, अनुशासनात्मक व्यवहार, गाली-गलौज या काम की जगह पर आम झगड़ा आत्महत्या के लिए उकसाना नहीं माना जा सकता है।
एकलपीठ ने अपने आदेश में कहा है कि “उकसाना” शब्द का मतलब बहुत बड़ा है और इसमें न सिर्फ़ सीधा उकसाना शामिल है, बल्कि ऐसा लगातार व्यवहार भी शामिल है जिससे ऐसे हालात बन जाते हैं कि मृतक के पास यह कदम उठाने के अलावा कोई चारा नहीं बचता। जांच के दौरान इकट्ठा किये गये साक्ष्यों को स्वीकार किया जाये तो मौजूदा याचिकाकर्ताओं के खिलाफ धारा 306 व 34 के तहत पहली नज़र में मामला बताता है। याचिकाकर्ताओं पर मृतक को लगातार हैरेसमेंट, बेइज्जत और रैगिंग करने के आरोप है। डिपार्टमेंटल या इंस्टीट्यूशनल जांच का दायरा क्रिमिनल जांच के दायरे से बिल्कुल अलग होता है। एंटी-रैगिंग कमेटी को इंस्टीट्यूशनल कार्रवाई के लिए साक्ष्य नहीं मिले, इसका मतलब यह नहीं है कि क्रिमिनल जांच अपने आप खत्म हो जाएगी। जांच एजेंसी ने इंडिपेंडेंट सबूत इकट्ठा किए हैं। ट्रायल कोर्ट के सामने लंबित आपराधिक कार्रवाई में कोई कानूनी कमी नहीं है। कोई आधार नहीं है कि कार्रवाई को जारी रखना कानून की प्रक्रिया का गलत इस्तेमाल होगा। एकलपीठ ने उक्त आदेश के साथ याचिकाओं को खारिज कर दिया।

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