फेरबदल की सरगर्मी ने मंत्रियों को किया बेचैन, विधायकों की बढ़ाई आस

ग्वालियर चंबल डायरी

हरीश दुबे:ढाई बरस का वक्त पूरा करने जा रही मोहन सरकार के मंत्रिमंडल के पहले फेरबदल की सुगबुगाहट ने ग्वालियर चंबल की सियासत में हलचल मचा दी है। मौजूदा मंत्री अपनी कुर्सी बचाने की कवायद के साथ ही विभागों में कटौती के खतरे को टालने की जद्दोजहद में हैं तो कतार में लगे वेटिंग इन मिनिस्टर्स ने अपने सपने पूरे करने के लिए दिल्ली और भोपाल के लिए दौड़ तेज कर दी है। ग्वालियर से दो, भिंड और मुरैना से एक एक विधायक इस वक्त मंत्री सुख भोग रहे है। अंदरखाने अभी तलक तो खबर यही है कि इनके मंत्री पद पर आंच नहीं है लेकिन ऐन वक्त क्या नए समीकरण बन जाएं, कहना मुश्किल है। मंत्रिमंडल में जिला वार नुमाइंदगी के पैमाने पर दतिया और शिवपुरी जिला अभी सिफर ही हैं। भिंड के नरेन्द्र सिंह कुशवाहा और सेबढ़ा के प्रदीप अग्रवाल कई बार चुने जा चुके पुराने विधायक हैं, लिहाजा खुलकर दौड़ में हैं। ग्वालियर अंचल के मिनिस्टर्स का रिपोर्ट कार्ड ठीक ही रहा है, लिहाजा उम्मीद यही की जा रही है कि इस अंचल पर कैंची नहीं चलेगी, नाम बढ़ेंगे ही।

सांसद के कार्यक्रमों से सिंधिया समर्थकों ने बना ली दूरी

ग्वालियर भाजपा में मची गुटीय खींचतान कम होने का नाम नहीं ले रही। सूबा सदर ने अपने हालिया दौरे में पार्टी के स्थानीय अलंबरदारों को जो एकजुटता का पाठ पढ़ाया था, वह भी बेअसर लग रहा है। इसकी ताजा नजीर गंगा दशहरा पर प्रशासन द्वारा मेहराब साहब की तलैया पर रखे गए श्रमदान कार्यक्रम में दिखी। चूंकि इस श्रमदान महोत्सव के खास मेहमान नरेन्द्र सिंह तोमर के नजदीकी सांसद भारत सिंह कुशवाहा थे, नतीजन सिंधिया समर्थक इस जलसे से नदारत रहे। प्रोग्राम पूरी तरह गैर सियासी और जल संरक्षण का पैगाम देने तक सीमित था लेकिन गुटबाजी में गले तक फंसे कार्यकर्ताओं ने गुटबंदी की जो लक्ष्मण रेखाएं पहले से खींच रखी हैं, उन्हें किसी भी सूरत में लांघने के लिए वे तैयार नहीं हुए। इस श्रमदान में एक-दो सिंधिया समर्थक तसला उठाते और फावड़ा चलाते दिखाई भी दिए लेकिन उनकी मौजूदगी निकायों में मिले सरकारी पद की औपचारिकता पूरी करने तक सीमित रही। बेमन से आए ऐसे चेहरे सांसद के करीब आने या उनके साथ श्रमदान करते फोटो खिन्चाने से बचते रहे। इसी कार्यक्रम में सवाल उठने लगे कि आलम यही बरकरार रहा तो अंजाम-ए-सत्ताईस क्या होगा। गौरतलब है कि सत्ताईस में निकाय चुनाव की चुनौती है।
समर नाइट मेला कागजों में निबटा, अब सावन मेले का सब्जबाग
ग्वालियर मेला अथॉरिटी के नए ओहदेदार स्वागत जुलूसों, तकरीरों और छत्रपों की वंदना में ही व्यस्त रहे और इधर समर नाइट मेला का पहले से तय वक्त ही निकल गया। नौतपा अपने उरूज़ पर पहुंचने के बाद मानसून करीब आ गया और गर्मियों के मेले की तैयारी किए बैठे कारोबारियों की उम्मीदों पर पानी फिर गया है। अब मेला अथॉरिटी नया सब्जबाग दिखाकर अपनी गलती ढांपने में लगी है कि समर नाइट मेला की जगह श्रावणी मेला लगेगा और इसके लिए तैयारी शुरू हो चुकी है। श्रावणी मेला का अर्थ है अगस्त तक इंतजार और बरसात का खतरा। दुकानदार मेला की कच्ची पक्की दुकानों में भरी बरसात के मौसम में अपना कारोबार सजाने के लिए कतई राजी नहीं हैं। सच्चाई यह है मेला के अधिकारियों ने समर नाइट मेला के लिए महीनों पहले से जो तैयारियां की थीं, वे अथॉरिटी में हुईं राजनीतिक नियुक्तियों के शोर शराबे में दबकर रह गईं।
उपचुनाव की रणभेरी कभी भी…
अब यह लगभग तय हो गया है कि दतिया विधानसभा सीट पर उपचुनाव होकर ही रहेंगे। दिल्ली हाईकोर्ट में चल रहे राजेंद्र भारती के मामले में अगली तारीख 14 जुलाई लगने के बाद राजनीतिक हलकों में आसार लगाए जा रहे हैं कि इस सीट पर चुनाव आयोग अब कभी भी उपचुनाव की तारीख का ऐलान कर सकता है। यहां से कई मर्तबा विधायक रहे और पिछला चुनाव हारे डॉ. नरोत्तम मिश्रा की भोपाल में अपनी पार्टी के प्रदेश प्रभारी महेंद्र सिंह से लंबी एकांत मंत्रणा के बाद उपचुनाव की संभावनाओं को और ज्यादा बल मिला है। तारीख अभी घोषित नहीं हुई है लेकिन चुनावी वैतरणी को पार करने के लिए दोनों दल कमर कसकर तैयार बैठे हैं। कांग्रेस के समक्ष सीट बचाने और भाजपा के सामने इस परंपरागत सीट पर 23 में खोई हुई प्रतिष्ठा को फिर से हासिल करने की चुनौती है। भाजपा में नाम तय है लेकिन कांग्रेस में एकराय नहीं बन पा रही।

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